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Saturday, 6 August 2022

पी.जी. कालेज कर्णप्रयाग, संस्कृत विभाग में सप्तदिवसीय कार्यशाला का समापन

 


पी.जी. कालेज कर्णप्रयाग, संस्कृत विभाग में सप्तदिवसीय कार्यशाला का समापन 


सोनिया मिश्रा/केदारखण्ड एक्सप्रेस

कर्णप्रयाग। डॉ शिवानंद नौटियाल राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय कर्णप्रयाग उत्तराखंड एवं आरडी एंड डीजे कॉलेज मुंगेर विश्वविद्यालय, मुंगेर इन दोनों महाविद्यालयों के संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में गत 7 दिनों से पंडितराज जगन्नाथ के काव्यशास्त्रीय अवदान एवं उनके ग्रन्थ रसगंगाधर पर कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा था। सात दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला का आज समापन समारोह आयोजित हुआ। 

समापन समारोह की अध्यक्षता गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति तथा वर्तमान में पतंजलि विश्वविद्यालय में प्रति कुलपति के रूप में कार्यरत प्रसिद्ध वैदिक विद्वान महावीर अग्रवाल जी ने की। कुलपति ने कहा कि पंडितराज जगन्नाथ के संदर्भ में प्रचलित अनेकानेक भ्रांतियों का निवारण करते हुए विद्यार्थियों को मूल ग्रंथ पढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि काव्यशास्त्र पढ़ने वाले सभी विद्यार्थियों को रसगंगाधर का अध्ययन एक बार अवश्य करना चाहिए। रसगंगाधर मात्र काव्य शास्त्रीय ग्रंथ नहीं है वह तात्कालिक भारत को भी अभिव्यक्त करता है। किस प्रकार बाहर से आए आक्रांताओं ने हमारी ज्ञान परंपरा को विच्छेद करने की कोशिश की तथापि जगन्नाथ जैसे आचार्यों ने स्वयं को जीवित रखते हुए अपनी ज्ञान परंपरा को भी जीवित रखा।

समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तराखण्ड के संस्कृत गौरव हिमालय पुत्र वी वी आर आई होशियारपुर पंजाब से सेवानिवृत्त आधुनिक साहित्यकार प्रोफेसर जगदीश प्रसाद सेमवाल जी उपस्थित थे। उन्होंने कार्यशाला के संयोजक डॉ. मृगांक मलासी असिस्टेंट प्रोफेसर कर्णप्रयाग की प्रशंसा करते हुए कहा कि छात्रकाल से ही उनका अध्ययन गम्भीर है। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि काव्यशास्त्र के सिद्धांतों की दार्शनिक  सिद्धांतों पर परीक्षण करके विद्वत समाज में स्थापित करने का श्रेय  या पंडित जगन्नाथ को दिया। उन्होंने कहा की पंडितराज जगन्नाथ ने न मात्र साहित्य शास्त्र को पढ़ा अपितु दर्शन व्याकरण इत्यादि शास्त्र को पढ़कर अपने ग्रंथ में उस ज्ञान को समाहित किया। रसगंगाधर को पढ़कर अनेक शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है इससे यह परिलक्षित होता है कि हमें किसी एक ही विषय को नहीं पढ़ना चाहिए अपितु अनेक विषयों में गति होनी चाहिए। साथ ही भावी शोधार्थियों को निर्देशित करते हुए उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब पण्डितराज के काव्यशास्त्र की आलोचना भी हमारे विद्वानों द्वारा की जानी चाहिए। उन्होंने कार्यशाला की प्रशंसा करते हुए कहा कि निश्चित रूप से डॉ. मृगांक मलासी एवं उनकी समस्त समिति का यह प्रयास श्लाघनीय है। डॉ. जोरावर सिंह, डॉ. मृगांक मलासी जैसे युवाओं से संस्कृत का भविष्य न केवल सुरक्षित है अपितु उसका विकास भी होगा।
 कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर सदाशिव द्विवेदी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने अपने वक्तव्य में कहा की संस्कृत काव्यशास्त्र का ज्ञान निश्चित ही हमें भावी पीढ़ी को भी कराना चाहिए। इस ज्ञान से भावी पीढ़ी यह जान पाएगी कि किस प्रकार जगन्नाथ का आदि आचार्य कितने तर्क प्रधान थे वह अपनी बात बिना तर्क के नहीं कहते थे। जगन्नाथ यद्यपि मुगल काल में उनके राज्य आश्रित कवि  थे तथापि उन्होंने ज्ञान को निरंतर जारी करते हुए हमारी एवं आगामी पीढ़ी के लिए अत्यंत उपकार किया। ध्यातव्य है कि प्रो.  सदाशिव द्विवेदी काशी परम्परा के  आधुनिक अद्वितीय विद्वान प्रो. रेवाप्रसाद द्विवेदी जी के पुत्र हैं। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर गिरीश चंद्र पंत जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय दिल्ली अपने भाषण में कहा की संस्कृत काव्यशास्त्र की धारा को निरंतर बनाए रखने का श्रेय संस्कृत के विभिन्न विद्वानों जैसे आनंद वर्धन भामह मम्मट विश्वनाथ जगन्नाथ जैसे आचार्यों को दिया जाता है जिन्होंने अथाह परिश्रम से इस ज्ञान को निरंतर बनाए रखकर हमारे सामने उपस्थित कराया अन्यथा आज की पीढ़ी एवं भावी पीढ़ी इस ज्ञान से वंचित हो जाती।

सारस्वत अतिथि के रूप में वीवीआर होशियारपुर में ही कार्यरत प्रोफेसर ऋतु बाला जी ने सबसे पहले कार्यशाला के आयोजकों को बधाई दी एवं विद्यार्थियों को इस तथ्य के लिए प्रेरित किया। उनका मानना है  कि स्नातकोत्तर के पश्चात शोध कार्य तक प्रायः हम सब परीक्षा के दृष्टिकोण से अपनी पढ़ाई लिखाई करते हैं, लेकिन जब शोध कार्य संपन्न हो जाता है तब हमारी वास्तविक वास्तविक अध्ययन प्रारंभ होता है । अतः हम सभी संस्कृत शोधार्थी एवं प्राध्यापकों को नियमित रूप से शास्त्रों एवं मूल ग्रंथों पर अध्ययन करते रहना चाहिए। हमें इस जान को जानकर उसे संवारना भी चाहिए और समझना भी चाहिए कि किस प्रकार उस समय के मनीषी आचार्य ज्ञान को बढ़ाने का प्रयत्न करते रहते थे। कार्यशाला में विशेष सान्निध्य महाविद्यालय कर्णप्रयाग के प्राचार्य प्रो. जगदीश प्रसाद जी का रहा। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय निरन्तर शैक्षणिक गतिविधियों को वर्धित कर रहा है। छात्र-छात्राओं के लिए निरन्तर ऐसे कार्यशाला सेमिनार का होना उन्हें निश्चित रूप से गवेषणा के क्षेत्र में आगे लेकर जाएगा। भविष्य में भी इस प्रकार के आयोजन महाविद्यालय करवाता रहेगा।

कार्यक्रम के प्रशिक्षक एवं कार्यक्रम को निरंतर बनाए रखने का श्रेय डॉ जवाहर सिंह जी को जाता है। जवाहरलाल नेहरू कॉलेज हरियाणा में सहायक आचार्य डॉ जोरावर जी ने निरंतर इस कार्यक्रम को चलाने हेतु पाठन कार्य किया। उन्होंने अपनी सुंदर एवं सरल अभिव्यक्ति से इस कार्यशाला को अत्यंत सुबोध बना दिया। रसगंगाधर ग्रंथ को काव्यशास्त्र की कसौटी माना जाता है एवं इसे एक कठिन ग्रंथ भी कहा जाता है किंतु आचार्य जोरावर सिंह जी एवं डॉ. मृगांक मलासी ने अपने कठिन मेहनत से इसे सरल बनाया। उन्होंने कहा की जीवन तो उन महर्षियों ने जिया जिन्होंने परतंत्रता में भी अपनी संस्कृति एवं ज्ञान को बनाए रखा बिना ऐसो आराम की जिंदगी जीते हुए निरंतर परिश्रम करते रहे।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ मृगांक मलासी ने संयोजन करते हुए संस्कृत की विभिन्न सूक्तियां के माध्यम से बताया की संस्कृत में किस प्रकार नैतिक आध्यात्मिक एवं वैचारिक ज्ञान उपलब्ध है जिसका अन्वेषण नहीं किया गया है इसका अन्वेषण किया जाना अत्यंत आवश्यक है इस हेतु इस प्रकार की कार्यशाला का आयोजन करवाया जाना अत्यंत आवश्यक है।
इस कार्यक्रम के संयोजक द्वय डीजे कॉलेज के  संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ विश्वजीत विद्यालंकार  एवं शिवानंद नौटियाल राजकीय महाविद्यालय, कर्णप्रयाग में संस्कृत के सहायक आचार्य   डॉक्टर मृगांक मालासी इन दोनों ने कार्यक्रम के अगली कड़ी के शीघ्र आयोजन की सूचना देने का विश्वास दिलाया। उन दोनों ने समवेत रूप से संस्कृत के उत्थान एवं उन्नयन के लिए निरंतरता से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अनेकानेक कार्यक्रम आयोजित करने की बातें  कहीं। इस कार्यक्रम के आयोजन में डॉक्टर हरीश बहुगुणा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए कहा की निश्चित ही इस प्रकार की कार्यशाला अत्यंत ज्ञानवर्धक सिद्ध हो रही है एवं इनका आउटकम शीघ्र ही देखने को प्राप्त होगा । 

कार्यशाला की समन्वयक डॉ चंद्रावती टम्टा जी ने कहा की संस्कृत में निहित ज्ञान को इस प्रकार के कार्यक्रम से बसकता है एवं समाज के समक्ष रखा जा सकता है। इस कार्यक्रम में अन्य विषय के शोधार्थियों प्राध्यापकों की उपस्थिति भी दर्ज की गई। कार्यक्रम में डॉक्टर शिवानंद नौटियाल राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय कर्णप्रयाग के राजनीतिक विभाग से डॉक्टर मदन लाल शर्मा जी भी उपस्थित रहे जिन्होंने कहा की मेरा संस्कृत प्रेम अत्यंत गाढ़ हुआ है जब से मैं इस कॉलेज के संस्कृत विभाग से जुड़ा हूँ। राजनीति विभाग के अन्य आचार्य श्री कीर्ति राम डंगवाल जी ने कहा कि संस्कृत के संपर्क में आने से मेरा ज्ञान भी बड़ा है। इसी कॉलेज के भूगोल विभाग के प्राध्यापक डॉक्टर आरसी भट्ट जी इस कार्यक्रम में निरंतर उपस्थित रहे । एवं हिंदी विभाग की डॉक्टर राधा रावत जी भी उपस्थित रहकर इस कार्यक्रम में संस्कृत के प्रति प्रेम को उजागर कर रही थी।
कार्यशाला में सभी का धन्यवाद करते हुए कार्यशाला के संयोजक डॉ. मृगांक मलासी ने कहा कि आज संस्कृत की चार पीढ़ियाँ एक साथ हैं। प्रो. जगदीश सेमवाल जी एवं प्रो. महावीर  अग्रवाल जी से हमारे गुरुजनों प्रो. गिरीश पन्त जी, प्रो.ऋतुबाला जी ने अध्ययन किया और उन से हम लोगों ने। आज हमारे छात्र भी हमारे साथ जुड़े हैं तो यह अत्यंत हर्ष का विषय है जो यह संयोग आज प्राप्त हुआ है।

ध्यातव्य है कि इससे पूर्व भी महाविद्यालय में इस प्रकार के कार्यक्रम कराए गए हैं जो छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इसके अंतर्गत गत वर्ष में एक ऑनलाइन सेमिनार एवं इसी वर्ष ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन में एक ऑफलाइन सेमिनार कराया गया जिसने अपनी ज्ञान वर्धना से अत्यंत सुर्खियां बटोरी थी। विभागाध्यक्षा डॉ. चन्द्रावती ने कहा कि आगामी समय में भी महाविद्यालय इस प्रकार के अनेकानेक कार्यक्रम कराता रहेगा जो छात्र एवं शोधार्थियों के हित का वर्धन करेंगे।


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