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Tuesday, 22 March 2022

77 राजकीय प्राथमिक और 10 जूनियर हाई स्कूल इस वर्ष बंदी की कगार पर, 10 से कम छात्र संख्या, सवालों के घेरे में फिर सरकारी शिक्षा व्यवस्था

  77 राजकीय प्राथमिक और 10 जूनियर हाई स्कूल इस वर्ष बंदी की कगार पर, 10 से कम छात्र संख्या, सवालों के घेरे में फिर सरकारी शिक्षा व्यवस्था

केदारखण्ड एक्सप्रेस न्यूज़

जब भी सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं तो सरकारी अध्यापकों का एक बड़ा नेटवर्क यानी कि शिक्षकों का संगठन जबरदस्त विरोध में सामने आ जाता है। वह चाहता है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर कोई सवाल खड़ा ही ना करें। लेकिन सवाल कैसे खड़े न किए जाएं जब हर वर्ष सैकड़ों सरकारी विद्यालय बंद हो रहे हैं वह भी शिक्षकों की नाकामी की वजह से। 

रुद्रप्रयाग में वर्तमान शिक्षण सत्र 2022-23 में रुद्रप्रयाग जनपद में 77 राजकीय प्राथमिक और 10 जूनियर हाई स्कूल में छात्र संख्या 10 से कम होने के कारण इन्हें बंद करने की कवायद शुरू हो गई है। शिक्षा विभाग ने इन विद्यालयों की सूची शिक्षा निदेशालय को भेज दी है और लगभग यह तय है कि यह विद्यालय इस सत्र में बंद हो जाएंगे। रुद्रप्रयाग जिले में बीते एक दशक में कम छात्र संख्या के कारण 46 प्राथमिक और जूनियर हाई स्कूल बंद हो चुके हैं। वर्तमान में जिले में 526 प्राथमिक व 128 जूनियर हाई स्कूल संचालित हो रहे हैं। जिनमें 87 विद्यालयों में छात्र संख्या 10 से कम है। 

शिक्षा विभाग के मानकों के अनुसार 10 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों का संचालन बंद कर दिया जाता है और उन विद्यालयों को आसपास के विद्यालयों में विलय कर दिया जाता है। 

यह स्थिति न केवल रुद्रप्रयाग जिले में बल्कि पूरे उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में देखी जा सकती है। सरकारी शिक्षा व्यवस्था में आ रही लगातार गिरावट सरकार संसाधनों की बदहाली के साथ साथ शिक्षकों की नाकामी भी है। क्योंकि यह सर्वविदित है कि सरकारी विद्यालयों के अध्यापक बच्चों की शैक्षणिक गतिविधियों में रुचि रखने से ज्यादा राजनीति में ज्यादा सक्रिय रहते हैं यही कारण है, यही कारण है कि आज सरकारी शिक्षा व्यवस्था लगातार रसातल की ओर जा रही है। जबकि प्राइवेट विद्यालयों में अल्प मानदेय पर पढ़ाने वाले अध्यापकों की लग्न मेहनत के कारण सरकारी विद्यालय के अध्यापक भी प्राइवेट स्कूलों में अपने पाल्यों को दाखिला दे रहे हैं। 

जो विद्यालय अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं उन विद्यालयों में भी अधिकतर नेपाली मूल बिहारी मूल के छात्र ही होंगे। सरकार वाकई अगर सरकारी शिक्षा व्यवस्था को ढर्रे पर लाना चाहती है तो सबसे पहले सरकारी नौकरी करने वाले अथवा सरकारी संस्थानों में कार्य करने वाले सभी अधिकारी कर्मचारियों के पाल्यों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने का जीओ जारी करें। इसके साथ ही जगह जगह विद्यालय खोलने की बजाए 57 गांव के सेंटर में एक ऐसा मॉडल विद्यालय बनाया जाए जहां सारे संसाधन उपलब्ध हो, पर्याप्त अध्यापक हो। सरकारी अध्यापक केवल पढ़ाने का ही कार्य करें। अगर वह किसी भी तरह से राजनीति या अन्य कार्यों में संलिप्त रहता है संस्पेंड कर दिया जाय। ऐसे कदमों से ही सरकारी शिक्षा व्यवस्था ढर्रे पर लौट सकती है अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब एक एक करके सारे सरकारी विद्यालय बंद हो जाएंगे।

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