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Friday, 10 September 2021

देखिए खास रिपोर्ट- रूद्रप्रयाग सीट से कांग्रेस में कौन है विधायक का मजबूत दावेदार!


 देखिए खास रिपोर्ट- रूद्रप्रयाग सीट से कांग्रेस में कौन है विधायक का मजबूत दावेदार! 

कुलदीप राणा आजाद/केदारखण्ड एक्सप्रेस

वर्ष 2017 में उत्तराखण्ड के विधान सभा चुनावों में उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी ने 70 में से 57 सीटों पर प्रचंड बहुत हासिल कर अब तक की ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। जबकि कांग्रेस के खाते में बस 11 सीटें ही आई थी जिसमें एक सीट रूद्रप्रयाग के केदारनाथ विधान सभा की शामिल है। तब मोदी आंधी में तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी के बड़े बडे किले ढह गए थे। खुद उस वक्त के मुख्यमंत्री हरीश रावत दो-दो सीटों से चुनाव हार गए थे। अब 2022 का चुनावी रण एक बार फिर तैयार है। लोकतंत्र में भागीदारी का दायित्व निभाते हुए जनता प्रदेश में सत्ता परिवर्तन तो कराती रही है कभी कांग्रेस कभी भाजपा के बाद इस बार तीसरे विकल्प की छटपटाहट भी सामने आ रही है। ऐसे इसलिए भी कि बीते 20 वर्षों में जनता को इन बड़ी पार्टीयों से केवल हताशा और निराशा ही हासिल हुई है। छोटा सा जिला रूद्रप्रयाग राजनीतिक दृष्टिकोण से हमेशा चर्चाओं में रहा है। खासतौर पर रूद्रप्रयाग विधान सभा की बात करें तो यहां सियासत का पारा हाई वोल्टेज ही रहा है। स्थापना काल से लेकर अब तक दिग्गज नेताओं का गढ़ रही  रूद्रप्रयाग विधान सभा में भले ही विकास के सवाल आज भी गौंण नजर आते हो लेकिन नेताओं की फेरिस्त दिनोंदिन लम्बी होती जा रही है। आगामी 2022 के चुनावों की अब तकरीबन उल्टी गिनती शुरू हो गई है। ऐसे में सत्ता रूढ़ दल समेत विपक्षी पार्टी और दावेदारों की एक बड़ी फौज वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए हर तरह के दांव पेंच आजमाने लगी है। आगामी चुनावों में सभी पार्टियों के प्रबल दावेदारों का विश्लेषण हम आपके सामने रख रहे हैं। पार्टियां किसकों टिकट देती है यह तो आने वाले दिनों में तय होगा लेकिन जनता के तराजू में किसका पलड़ा भारी रहता है यह देखना दिलचस्प होगा। चलो रूद्रप्रयाग की राजनीति में दावेदारों पर एक नजर डालते हैं-

उत्तराखण्ड में भाजपा को प्रचंड बहुमत देने के बाद भी साढे चार वर्षों में तीन मुख्यमंत्रियों को बदलना राजनीतिक अस्थिरता भाजपा के लिए जनता की अदालत में गले की फांस बन गई है। तीन मुख्यमंत्रियों को बदलने के सवाल पर वह असहज नजर आ रही है। 57 विधायकों के बावजूद आयोग्य मुख्यमंत्रियों को कुर्सी पर बैठाना और बार बार मुख्यमंत्रियों को बदलकर विकास कार्यों में अवरोध पैदा करने से जनता त्रस्त हो चुकी है, में 2022 के चुनाव अहम माने जा रहे हैं। हालांकि पांच साल भाजपा और पांच साल कांग्रेस की बजाय इस वक्त जनता का मूड़ तीसरे विकल्प की तरफ जाने का भी है। आम आदमी पार्टी की उत्तराखण्ड में एन्ट्री और यकूड़ी की तरफ युवाओं का बढ़ता रूझान यह भी संकेत दे रहा है इनमें से ही एक पार्टी तीसरा विकल्प है।

रूद्रप्रयाग विधान सभा में वर्तमान में निर्वाचित भाजपा के विधायक हैं लेकिन हम पहले बात कर लेते हैं विपक्षी दल कांग्रेस की। क्योंकि पिछले चुनावों में मोदी आंधी के साथ साथ कांग्रेस पार्टी को डुबाने में संगठन के भीतर चल रही गुटबाजी का भी विशेष योगदान था बावजूद कांग्रेस की प्रत्याशी लक्ष्मी राणा ने 15 हजार से भी अधिक वोट लेकर इस बात पर मुहर लगा दी थी कि कांग्रेस पार्टी का जनपद में बड़ा वजूद है। वो भी ऐसी पारिस्थिति में जबकि कांग्रेस से बगावत कर प्रदीप थपलियाल ने भी निर्दली चुनाव लड़ा था जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस को ही हुआ था। इस बार भी भले ही कांग्रेस फिर से एकजुट होने का मंत्र फूंक रही हो लेकिन कांग्रेस पार्टी के भीतर प्रत्याशियों की सूची भी कम नहीं है। हालांकि मुख्य भूमिका में यहाँ 4 चेहरे माने जा रहे है। 

प्रदीप थपलियाल- पिछली बार कांग्रेस से टिकट न मिलने के बाद बगावत


कर निर्दलीय चुनाव लड़े प्रदीप थपलियाल  को भले ही 5 हजार 818 वोटों पर संतोष करना पड़ा हो लेकिन इस बार वे पहले से कई ज्यादा मजबूत स्थिति में नजर आ रहे हैं। विधायक प्रत्याशी की दावेदारी का संकेत वे प्रदेश आलाकमान के सामने अपने शक्ति प्रदर्शन से कई बार दे चुके हैं। जबकि अपनी विधान सभा क्षेत्र में वे जनता से मिलने का कोई भी मौका नहीं गवा रहे हैं। जखोली से ब्लॉक प्रमुख होने के नाते करीब 108 ग्राम पंचायतों से सीधा उनका सम्पर्क बना हुआ है। वर्ष 2019 में निर्विरोध क्षेत्र पंचायत सदस्य चुने जाने के बाद जखोली ब्लॉक प्रमुख बने और उसके बाद तुरंत कोविड़-19 संक्रमण होने के कारण लाकडाउन लग गया। इस आपदा के संकट काल में उन्होंने तीन माह तक सरकारी ड्यूटी में लगे अधिकारी कर्मचारियों को निःशुल्क खाने और रहने की व्यवस्था जिला मुख्यालय में की। जबकि कोविड़ के प्रथम और द्धितीय चरण में जखोली के 108 ग्राम पंचायतों में मास्क, सेनेटाइज, इन्फ्रा थर्मामीटर के साथ साथ प्रत्येक गांव में 3 अक्सोमीटर, डिजिटल थर्मामीटर, क्लॉथमास्क साथ ही आशाओं को पीपी कीट का निःशुल्क वितरण किया। 

प्रदीप थपलियाल 1993 में गढ़वाल विश्वद्यालय की छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे। वर्ष 1996 में वे गढ़वाल विवि से चीफ प्रिफेक्ट रहे व 1999 में विश्वविधालय के उप विजेता अध्यक्ष रहे। इसके बाद उन्होंने 2003 में जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसी दौरान वे वर्ष 2008 तक जिला पंचायत उपाध्यक्ष भी रहे। जिला पंचायत उपाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने विभिन्न सड़कों के डामरीकरण, विद्यालयों के उच्चीकरण के साथ साथ जखोली तहसील की घोषणा भी करवाई जिसे बाद में तहसील का पूर्ण दर्जा मिला। 2007 से 2014 तक प्रदीप थपलिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी जबकि 2015 से 2017 तक वे रूद्रप्रयाग काग्रेस कमेटी के जिलाध्यक्ष पद पर रहे। इस दौरान उन्होंने अशासकीय विद्यालयों को अनुदान, तिलवाड़ा को नगर पंचायत को बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 2017 में रूद्रप्रयाग विधान सभा से निर्दलीय चुनाव लड़ा जिसमें उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। प्रमुख रहते हुए स्वास्थ्य, मनरेगा, कोविड़ के कार्यों  के साथ ही जल संवर्द्धन को लेकर 2021 में दीन दयाल उपाध्याय राष्ट्रीय पुरूस्कार से भी नवाजा गया। वर्ममान में भी वे लगातार क्षेत्रीय जनता के बीच बने हुए हैं। हालांकि इस बार कांग्रेस पार्टी उन पर भरोसा कर टिकट देती है या नहीं यह अभी भविष्य के गर्भ में है। 

लक्ष्मी सिंह राणा- पिछली बार के विधान सभा चुनाव से पहले कांग्रेस से छः साल के लिए निष्काशित हो रखी लक्ष्मी राणा को एकाएक नामाकन के पूर्व


कांग्रेस पार्टी द्वारा लक्ष्मी राणा पर भरोसा जताकर उन्हें टिकट दिया गया, लेकिन उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा। हालांकि लक्ष्मी राणा द्वारा 15 हजार से अधिक वोट लेकर अपना दबदबा भी जरूर कायम किया गया था। क्योंकि इससे पहले रूद्रप्रयाग विधान सभा के चुनावों में हार जीत का फैसला 13 से 15 हजार वोटों के ही बीच होता आया है। लक्ष्मी राणा ने रूद्रप्रयाग में जिला पंचायत अध्यक्ष रहते हुए महिलाओं के बीच खूब पैंठ बनाई थी खासतौर पर अपने गृह क्षेत्र जखोली में उनका काफी दबदबा था। जबकि महिला होने के बाद भी वे एक दबंग नेता की छवि रखती हैं। पिछले विधान सभा चुनावों के परिणाम उनके पक्ष में न आने से वे लम्बे समय तक सीन से गायब रही। यूँ कहें तो जनता से बिल्कुल कट सी गई थी। हालांकि चुनावों से पहले वे एक बार फिर सक्रिय हो गई हैं। 

लस्या पट्टी के पाला कुराली गाँव के जसपाल सिंह राणा के घर 5 जुर्लाइी 1965 को ठाणे (महाराष्ट्र) में जन्मी लक्ष्मी की स्कूली शिक्षा वहीं हुई। पिता की असामायिक मृत्यु के कारण परिवार को वापस गाँव में आना पड़ा और 17 वर्षीय लक्ष्मी के कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। गांव में काम करते हुए ग्रामीण समस्याओं और महिलाओं की दुर्दशा ने झकझोरा। इसी से सामजिक क्षेत्र में उतरने तथा महिलाओं और गा्रमीण विकास के लिए कुछ करने के निश्चय को बल मिला। साथ ही अपनी शिक्षा को भी आगे बढ़ाया और एम.ए, एलएलबी, किया। चिरबटिया में ‘जन विकास संस्थान’ के संस्थापन बैशाखी लाल से मिल कर इस दिशा में कार्य आरम्भ किया। महिला व ग्राम विकास के कार्यों को आगे बढत्राते हुए अनेक गतिविधियां संचालित कीं। इसके बाद स्वयं ही ‘महिला उत्थान एवं बाल कल्याण संस्थान’ का गठन कर महिला सशक्तीकरण, स्वास्थ्य व शिक्षा, स्वजल, पर्यावरण सुरक्षा, आपदा प्रबंधन एवं राहत जैसी गतिविधियों को आगे बढ़ाया। इससे उनकी छवि लगातार निखरतली गई और लोकप्रियता बढ़ती गई। 

1996 में पंचायती चुनावों की घोषणा होते ही क्षेत्र के प्रबुद्ध लोगों ने उनसे ब्लॉक प्रमुख का चुनाव लड़ने का आग्रगह किया तो उसमें प्रत्याशी बन गईं और प्रमुख चुन ली गईं। भरपूर उत्साह और ऊर्जा से परिपूर्ण लक्ष्मी सिंह राणा ने जखोली विकासखण्ड में कृषि, उद्यानीकरण, पशुपालन, मत्स्य उत्पाद आदि की अनेक परियोजनायें लाकर कृषकों व महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का कार्य किया। सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों पर अनेक पदों पर कार्य करते हुए वे 2014 में जिला पंचायत अध्यक्ष रूद्रप्रयाग चुनी गई। इसके अलावा जैविक उत्पाद परिषद उत्तराखण्ड की अध्यक्ष, राज्य उपभोक्ता प्रतिरोद आयोग की सदस्य जैसे पदों पर भी कुशलतापूर्वक कार्य कर चुकी हैं। लक्ष्मी राणा का राजनीतिक अनुभव लम्बा होने के कारण उनकी भी प्रबल दावेदारी हैं किन्तु पिछले कुछ समय से जनता के बीच बनी दूरी को पाटना उनके लिए चुनौतिपूर्ण जरूर रहेगा।

मतबर सिंह कण्डारी- मतबर सिंह कण्डारी वैसे तो किसी परिचय के मौहताज नहीं हैं क्योंकि उनका राजनीतिक जीवन लम्बा है। 25 वर्ष तक


विधायक और 10 वर्ष प्रमुख रहे चुके कण्डारी पेशे से अध्यापक थे। साल 1964 से 1974 तक अध्यापक उन्होंने बच्चों को तालिम दी। उसके बाद वे राजनीति के क्षेत्र में उतरे। उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन इतनी मजबूत बनाई की हार जैसा शब्द साढ़े तीन दशकों तक उनके जीवन में कभी आया ही नहीं। वर्ष 1982 में वे पहली बार रूद्रप्रयाग जिले के जखोली से प्रमुख चुने गए और लगातार दो बार प्रमुख रहे। उसके बाद भाजपा के टिकट पर पहली बार वर्ष 1991 में देवप्रयाग विधान सभा सीट से चुनाव लड़ा जीत हासिल की। पुनः 1993 में विधायक चुने गए। उसके बाद 1997 में पर्वतीय विकास मंत्री बने। उस दौर में उत्तराखण्ड का गठन न होने कारण यह यूपी का हिस्सा था। तब पर्वतीय क्षेत्रों की  19 विधान सभा सीटें हुआ करती थी। पर्वतीय विकास मंत्री रहते हुए उन्होंने कई हाईस्कूल, इण्टर मीडिएट कॉलेजों की स्थापना करवाई, झूला पुलों, सड़कों, आयुर्वेदिक अस्पतालों के साथ ही नव निर्माण हेतु सड़कों की स्वीकृति भी दी। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद पहले विधान सभा चुनाव में 2002 में वे रूद्रप्रयाग विधान सभा से भाजपा से विधायक चुने गए। उसके बाद पुनः 2007 में विधायक बनने के साथ ही सिचाई मंत्री भी रहे। इस दौरान उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में हैण्ड पंम्प और नलकूप जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं का निर्माण किया। मातबर सिंह कण्डारी का 1982 से निरंतर अजेय विजयरथ आखिरकार 2012 में थमा जब उन्हीं के साडू भाई हरक सिंह रावत कांग्रेस के टिकट से उन्हें करारी शिकस्त मिली। हालांकि हारने का एक कारण यह भी माना जाता है कि मंत्री बनने के बाद मातबर सिंह कण्डारी का अपनी विधान सभा की ओर अधिक ध्यान न रहना था। जबकि हरक सिंह रावत दबंग और दिग्गज नेता के रूप में जाने और चुनाव को कैसा जीतना है इसकी कुशल रणनीति भी मातबर सिंह कण्डारी के लिए हार का बड़ा करण बनी। जबकि 2017 में भाजपा से उनका टिकट कटा तो उन्होंने भाजपा को ही अलविदा कह दिया। उन्होंने टिकट की चाह में कांग्रेस पार्टी का दामन तो थामा लेकिन तब उन्हें वहां भी टिकट नहीं मिल पाया। इस बार वे पुनः टिकट की चाह में अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं और लगातार क्षेत्र भ्रमण कर रहे हैं। कुल मिलकार देखें तो जितना बड़ा कद और जितना लम्बा समय मातबर सिंह कण्डारी को मिला उस लिहाल से उनके कार्य गौंण हैं। 
 

अंकुर रौथाण- युवाओं में रूद्रप्रयाग विधान सभा से अंकुर रौथाण काफी लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया पर किए गए कांग्रेस प्रत्याशियों के सवें में वे

हमेशा युवाओं की पहली पंसद रहे हैं। पूर्व में जिला भेषज संघ में अध्यक्ष और युवा नेता अंकुर रौथाण का नाम टिकट की दौड़ में है। वर्ष 2007 में गढ़वाल विश्वविधालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके रौथाण युवाओंपर खासी पकड़ रखते हैं। जन सरोकारों के प्रति उनकी निष्ठा और साफ सुथरी सामाजिक छवि के कारण भी उनकी दावेदारी अब सबसे मजबूत नजर आती है। राहुल गांधी के साथ उनकी नजदीकियां और छात्र छात्राओं में उनकी लोकप्रियता चुनाव नतीजों को पलट सकती है। छात्र राजनीति और शिक्षक परिवार से सम्बधित होने का फायदा भी इन्हें मिल सकता है। ठेकेदारी और व्यवसायिकता से दूर अंकुर रौथाण अपने गांव में रहकर सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता से भागीदारी करते रहते हैं।