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Friday, 25 June 2021

आखरी बार ढोल नगाड़ों के साथ की ग्रामीणों ने इन खेतों में रोपाई


आखरी बार ढोल नगाड़ों के साथ की ग्रामीणों ने इन खेतों में रोपाई


@सोनिया मिश्रा/केदारखण्ड एक्सप्रेस 

चमोली। इन खेतों में फिर न कभी बैलों की जोड़ी दिखाई देगी और ना हल। न पानी से लबालब भरे खेतों में धान की रोपाई करती महिलाओं की लंबी श्रृंखला दिखाई देगी और ना ही लहलहाती हुई फसल। आखरी बार ग्रामीणों ने ढोल नगाड़ों के साथ इन खेतों में रोपाई की है। हां अब यहां दिखाई देगा तो वह है रेल। विकास के नाम पर ग्रामीणों ने अपनी पीढ़ियां पुस्तानियों की जमीन सरकार को सौंप दी है।

बात कर रहे हैं चमोली जनपद के गोपेश्वर में सौकोट गांव की। पीढ़ियों से जुड़े इन खेतों का अन्न खाकर वे पले-बढ़े थे। इनकी माटी की खुशबू उनकी रग-रग में बसी थी। इनसे जुदाई की कभी कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन उनके गांव से रेल गुजरेगी। विकास की पटरी पर उनका गांव भी दौड़ेगा। यही सोचकर किसानों ने अपने खेत सरकार को सौंप दिए। ढोल-दमाऊं बज रहे थे। जागर गाती महिलाएं पानी से भरे खेतों में धान रोप रही थीं। आंखें पनीली थीं। इन खेतों में आखिरी बार की रोपाई को उन्होंने गम और खुशी का अनूठा उत्सव बना दिया। गोपेश्वर से सैकोट गांव करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित है। रेलवे स्टेशन के लिए गांव की करीब 200 नाली भूमि अधिग्रहीत की गई है। गांव में करीब 150 परिवार रहते हैं। ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय कृषि व पशुपालन है। यही कारण है कि इस गांव पर आज तक पलायन की छाया नहीं पड़ी। गांव में मकानों के आसपास ही दूर-दूर तक बड़े-बड़े खेत हैं। ग्रामीण बड़े उल्लास के साथ खेतों में धान की रोपाई करते हैं। इसकी तैयारी एक माह पहले से शुरू हो जाती है। महिलाएं मिलकर धान की बिज्वाड़ (धान के पौधे) की निराई-गुड़ाई करती हैं।