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Thursday, 20 May 2021

क्षेत्र के प्रख्यात सरदार बच्चन सिंह राणा अब नहीं रहे, जानिए कौन थे सरदार बच्चन सिंह-

क्षेत्र के प्रख्यात सरदार बच्चन सिंह राणा अब नहीं रहे, जानिए कौन थे सरदार बच्चन सिंह-


डेस्क : केदारखण्ड एक्सप्रेस न्यूज़ 

रूद्रप्रयाग। विकास खण्ड जखोली के उरोली गांव के प्रख्यात सरदार बच्चन सिंह राणा अब हमारे बीच नहीं रहे।दरअसल स्वास्थ्य विभाग जखोली के द्वारा उरोली में 26 अप्रैल को कुछ करोना जाँच सैंपल लिए गए थे।जिनकी रिपोर्ट एक मई को प्राप्त हुई। जिसमें सरदार बच्चन सिंह राणा सहित चार लोग संक्रमित पाए गए। दो दिन बाद अचानक इनका स्वास्थ्य ख़राब होने के कारण 3 अप्रैल को इन्हें उपचार के लिये माधवाश्रम अस्पताल रुद्रप्रयाग में भर्ती किया गया है । जहाँ 11 मई को इनकी करोना रिपोर्ट नेगेटिव होने पर इन्हें अस्पताल से छुट्टी दी गई। 16 मई को अचानक उनकी तबीयत फिर से ख़राब हो गई और 17 मई शाम को आठ बजे इन्होंने अंतिम साँस ली।  18 मई को इनके पैतृक घाट उरोली में इनके तीनों भाइयों मातबर सिंह राणा, सौकार सिंह राणा व दरमान सिंह राणा एवं गाँव के सभी लोगों की उपस्थिति में इनके पुत्र दर्शन सिंह एवं रिशन सिंह राणा ने उन्हें मुखाग्नि देकर उनकी अंत्येष्टि के साथ ही जनपद रुद्रप्रयाग के एकमात्र सरदार क़े साथ साथ एक बड़ी हस्ती का अंत हो गया।


सरदार बच्चन सिंह की पगड़ी, तलवार, केस, कंगी और कृपाण हम सबको हमेशा याद रहेगा। विकास खंड जखोली के ग्राम उरोली के स्व० भोपाल सिंह राणा की चार पुत्र व दो पुत्रियों सहित छः संतानें थी उनके पहले पुत्र  बच्चन सिंह राणा का जन्म 1935 में हुआ था। अभी वो कक्षा आठवीं तक ही पढ़ाई कर पाए थे कि परिवार की स्थिति बहुत ख़राब होने लगी। जिससे उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़कर काम धंधे के लिए घर छोड़ना पड़ा,और घर से नौकरी के लिए निकल पड़े, अभी वह रुद्रप्रयाग ही पहुँचे थे कि वहाँ उन्हें हेमकुंड यात्रा से लौट रहे लुधियाना निवासी सरदार बाबा मौदम सिंह जी से मुलाक़ात हुई । सरदार बाबा मौदम सिंह जी उन्हें अपने साथ अपने गाँव लखनपुर लुधियाना ले गए । बाबा मौदम सिंह जी ने अपनी संतानों की तरह इन्हें भी पंजाबी भाषा में इनकी आगे की शिक्षा पूर्ण करवायी और वो उनके परिवार के सदस्य बनकर उनके साथ वही लखनपुर लुधियाना में रहने लगे।  

सिख परिवार के साथ रहते-रहते इनकी भेष- भूषा एवं रहन सहन और वहाँ की भाषा व संस्कृति उनको भा गई और ये बचनसिंह राणा से सरदार बचन सिंह राणा बन गए ।शिक्षा पूर्ण होने के बाद 1957 में इनको सरदार मौदम सिंह द्वारा  इन्हें हेमकुण्ड दरबार साहिब में वहाँ की मूलभूत समस्याओं के निराकरण की ज़िम्मेदारी दी गई है जिससे इनके द्वारा पूर्ण ईमानदारी पूर्वक निर्वहन किया गया।  

सरदार बाबा मौदम सिंह के प्रतिनिधि के रूप में इन्हीं के नेतृत्व में हेमकुण्ड दरबार साहिब में आने वाले यात्रा के मुख्य पड़ाव गोविन्दघाट में गुरुद्वारे का निर्माण करवाया गया। हेमकुंड दरबार साहिब में आने वाले यात्रियों में धीरे-धीरे भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल जैसे  बड़ी बड़ी हस्तियों से इनका परिचय बढ़ता गया और इसका नतीजा ये हुआ कि एक तरफ़ तो ये मूल हिन्दू से परिवर्तित सिख थे और दूसरी तरफ़ इनका हेमकुण्ड दरबार साहिब में वर्चस्व बढ़ता गया जिसे देख सिखों के कुछ चाटुकारिता जैसे लोगों को अच्छा नहीं लगा और वे इनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करने लगे । वहीं दूसरी तरफ़ सरदार बाबा मौदम सिंह जी की भी हृदय घात  से मृत्यु हो गई 

अपने स्वाभिमान एवं शिक्षा में अच्छी गुणवत्ता के कारण उनके व्यवहार की परख को समझते हुए उन्होंने 1967 में हेमकुंड दरबार साहिब गुरुद्वारा की अपनी ज़िम्मेदारियों को अन्य के सुपुर्द कर बजीरा (कट्ईं )में अपनी छोटी सी दुकान खोलकर अपना व्यवसाय कर अपने परिवार की आजीविका चलाने लगे तो कुछ वर्षों तक वे वहीं पर रहने के बाद पुनः पंजाब चले गए और वहाँ गुरुद्वारे में सेवादार के रूप में काम करने लगे।

जिसमें शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी दरबार साहिब अमृतसर के द्वारा ग्रंथी (सिखों ग्रंथ के मुख्य पाठारथी) के रूप में  इनको नियुक्ति दी गई जिससे इन्हें स्वर्ण मंदिर अमृतसर साथ साथ कमेटी के अधीन सभी गुरुद्वारों में अरदास एवं गुरुवाणी प्रवचन करने का अवसर मिला।

वर्ष 1984 में पाकिस्तान की शह पर जरनैल सिंह भिंडरावाला के नेतृत्व में एक उग्रवादी संगठन ने खालिस्तान को अलग राष्ट्र की माँग पर स्वर्ण मंदिर सहित मंदिर के अकाल तख़्त पर क़ब्ज़ा कर लिया । अकाल तख़्त का मतलब एक ऐसा सिंहासन जो अनंतकाल के लिए बना हो यही से तो सिख धर्म के लिए हुक्मनामी जारी होते हैं । वहाँ इनके साथ कही ग्रंथियों एवं सेवादारों को भी बंदी बनाया गया और सरकार से खालिस्तान की माँग करने लगे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी के आदेश पर एवं सेना की सूझ-बूझ ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम देकर उग्रवादियों के सरगना जरनैल सिंह भिंडरावाले सहित लगभग 500 उग्रवादी मारे गए थे साथ ही सेना के भी कई सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी । इस ऑपरेशन के बाद स्वर्ण मंदिर में सभी अपहरण किए गए ग्रंथीयों एवं सेवादारों को सेना ने छुड़ा लिया और उनको भी लगभग दो माह तक नज़रबंद कर उनके बारे में गहन जानकारियां हासिल की गई ।  मामाजी के बारे में मैं भी तत्कालीन जिलाधिकारी टिहरी के आदेश पर पूर्ण जानकारी हासिल कर सेना द्वारा मामाजी को सकुशल घर भेजा गया। पुनः स्थितिसामान्य होने पर मामाजी ने शिरोमणि गुरुद्वारा कमेटी अमृतसर मैं उपस्थित होकर अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर  वर्ष 1996 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसार से सेवानिवृत्त हो गए । सेवानिवृति के बाद अपने गाँव उरोली में एक कुशल कृषक के रूप में कई प्रकार की सब्ज़ियों का उत्पादन करअनेकों बार किसान मेला जखोली एवं कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर के द्वारा सम्मानित किए गए।


(यह जानकारी सरदार बच्चन सिंह राणा के भांजे महावीर पंवार (भाजपा नेता) द्वारा दी गई है)