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Tuesday, 9 February 2021

ग्राउंड जीरो रिपोर्ट : त्रासदी, बेबसी और मातम सा मरघट पसरा है तपोवन घाटी में, शोक विलाप में लापता परिजन

 



ग्राउंड जीरो रिपोर्ट : त्रासदी, बेबसी और मातम सा मरघट पसरा है तपोवन घाटी में, शोक विलाप में  लापता परिजन

-कुलदीप राणा आजाद/केदारखण्ड एक्सप्रेस 

चमोली। 7 फरवरी की सुबह जोशीमठ तपोवन की मनमोहक घाटी को प्रकृति ने ऐसा उजाड़ा कि उन तस्वीरों ने पूरे देश को विचलित कर दिया था। खौफखाती इन तस्वीरों के बीच इस खबर ने रैंणी और तपोवन घाटी के लोगों को और परेशान कर दिया कि ऊपरी क्षेत्र में फिर से विशालकाय झील बन रही है जो कभी भी मौत का ताण्डव मचा सकती है। अब रैणी और तपोवन घाटी के लोग नदी में चुटकी भर पानी बढ़ने से भी भयभत जाते हैं।

पहाड़वासियों ने एक बार फिर विकास की कीमत चुकाई है। चमोली जिले में उच्च हिमालयी क्षेत्र नंदा ग्लेशियर के टूटने से आए पानी के सैलाब ने ऋषि गंगा पर बना पांवर प्रोजेक्ट और तपोवन विष्णुगांढ़ जल विद्युत परियोजना को पलक-झपकते ही ऐसा तबाह कि उसमें कार्यरत सैकड़ों जिंदगियां असमय ही कालकवित हो गई। नंदा ग्लेश्यिर से आए उस मौत के सैलाब ने चंद ही पलों में सालों से निर्मित किए जा रहे जल विद्युत परियोजनाओं को तिनके की तरह बहा ले गई। बाढ़ की उस भीषण लहरों ने रेंणी गाँव के एक मकान को भी नेस्तनाबूत किया। पैदल रास्ते, सड़क, मोटरपुल, झुला पुल सब कुछ सैलाब ने अपने आगोश में ले लिया। इस भीषण त्रासदी के प्रत्यक्षदशी आज भी उन पलों को याद करते हैं तो खौफजदा हो जाते हैं।

अब लगातार इस आपदा में लापता लोगों के परिजन घटना स्थल की ओर पहुँच रहे हैं। अपनों के जिंदा रहने की उम्मीद उनके आँखों में अब भी है लेकिन जैसे जैसे समय व्यतीत हो रहा है वैसे-वैसे उनका धैर्य जवाब दे रहा है किन्तु किसी भी अनहोनी की बातें उन्हें अन्दर से झकझोर कर दे रही हैं। हरिद्ववार, रूड़की, सहारनपुर और देश के विभिन्न हिस्सों से अपनों की तलाश में लोग घटना स्थल पर पहुँच हैं और सेना के उस आॅपरेशन पर इस उम्मीद को लगाये बैठे हैं कि उनका अपना उनके सामने आ जाय। जल विद्युत परियोजना क्षेत्र में मचे प्रलयकारी तांडव ने पूरे इलाके को मरघट के मातम में बदल दिया है। दो सौ से अधिक लोगों ने विकास की कुर्बानी दी है। पहाड़ों में हमेशा में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध होता रहा है। इन दोनों परियोजनाओं के आरम्भ होने के दौरान भी स्थानीय लोगों ने विरोध किया था लेकिन विनाश पर आधारित विकास के इस घिनौने माॅडल के पैरोकारों ने आखिर क्यों थी, कीमत तो हर बार पहाड़वासियों को चुकानी पड़ती है। त्रासदी, बेबसी और मातम में नेता-मंत्री को राजनीति करने का अवसर मिला है और अफसरों और नौकरशाहों को गाढ़ी मलाई मिल गई है। 

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