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Tuesday, 12 January 2021

कुली बेगार प्रथा : दास्तां से मुक्ति के सौ साल

 


कुली बेगार प्रथा : दास्तां से मुक्ति के सौ साल 




-कुलदीप राणा आजाद/केदारखण्ड एक्सप्रेस 

रूद्रप्रयाग। कुली बेगार प्रथा के विरूद्ध ककोड़ाखाल क्रान्ति की शताब्दी वर्षगाठ मनाई गयी, जिसमें पूर्व सीएम हरीश रावत ने शिरकत कर स्वतंन्त्रा संग्राम सैनानियों को अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित की। क्या थी कुली बेगार प्रथा आइए इस रिपोर्ट के जरिए समझते हैं-

स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रूद्रप्रयाग जिले की ऐतिहासिक स्थली ककोड़ाखाल में जब कुली बेगार प्रथा की 100वीं वर्षगाठ मनाई गई तो बिटिश हुकुमत के काले करनामों की तस्वीरें भी जिंदा हो गई और जिंदा हो गई हमारे स्वतंत्रता संग्राम के उन अदम्य साहसी वीर बाहदुरों की गौरव गाथा भी। गढ़वाल ने भी स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई थी और उसके सूत्रधार थे अनसूया प्रसाद बहुगुणा, जिन्होंने बेगार प्रथा के खिलाफ ककोड़ाखाल में ऐतिहासिक आन्दोलन चलाया और बिटिश हुकुमत में गढ़वाल के डिप्टी कमिश्नर पी. मैसन तथा उसके अमले को वहाँ से भाग जाने के लिए विवश कर दिया था। इस ऐतिहासिक आन्दोलन में उन्होंने जिस अदम्य साहस और नेतृत्व कौशल का परिचय दिया, उसी से उन्हें गढ़केसरी के रूप में जनता ने सिर-आँखों पर बिठाया। 12 जनवरी 1921 में दशजूला क्षेत्र के ककोड़ाखाल में असहयोग आन्दोलन ने ऐसी सफलता अर्जित की कि डिप्टी कमिश्नर मेसन और उनके अमले को बेगार के बदले भारी जन विरोध का सामना करना पड़ा और उसे ककोड़ाखाल से रातोंरात भागना पड़ा। इसी के बाद तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने सरकार को सूचित किया कि अब गढ़वाल में बेगार नहीं मिल पाएगी।

दरअसल अंग्रेजों के शासनकाल में गढ़वाल में कुली बेगार प्रथा और बदायस जैसी कुप्रथाओं की वजह से यहां के ग्रामीणों को भारी अत्याचार सहना पड़ता था। इस प्रथा के तहत अंग्रेज अधिकारियों को गढ़वाल भ्रमण के दौरान निःशुल्क में उनकी उत्तम दर्जे की खाने रहने और उनके सामना ढोने के प्रबन्ध ग्रामीणों द्वारा हर हाल में किया जाना था। ऐसा न होने पर ब्रिटिश शासकों द्वारा ग्रामीणों को भारी यातनाएं दी जाती थी। इन कुप्रथाओं के विरोध में गढ़ केशरी अनसूया प्रसाद बहुगुणा ने ककोड़ाखाल से ही खिलाफत शुरू की थी और बाद में उनके साथ बड़ी संख्या में लोग जुड़ते गए और यह आन्दोलन चिंगारी से भयानक आग का स्वरूप लेने लगा। अंततः अंग्रेजों का हार मानना पड़ा और वे यहां से रातोंरात भाग खड़े हुए।  हालांकि इस आन्दोलन के दौरान 60 से अधिक लोगों को ब्रिटिश हुकुमत द्वारा जेलों में बंद कर भारी यातनाएं भी दी गई।  

ककोड़ाखाल आन्दोलन की 100वीं वर्षगाठ पर समिति के अध्यक्ष ईश्वर सिंह बिष्ट के नेतृत्व में भव्य आयोजन किया गया। जिसमें उत्तराखण्ड के के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ ही अनेक जनप्रतिनिधियों और क्षेत्रीय जनता ने स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धासुमन अपित की। हालांकि लोगों के दिलों में आज भी यह दर्द जरूय था कि बेगार प्रथा के खिलाफ 60 से अधिक जिन्ह आन्दोलनकारियों ने जेलों में बंद होकर भारी यातनाएं सही थी उन्हें आज भी स्वतंत्रता सेनानियों का दर्जा नहीं मिल पाया है जबकि ऐतिहासिक स्थली ककोड़ाखाल भी वह स्वरूप नहीं मिल पाया जो उसे मिलना चाहिए था।  

इस मौके पर समिति के पूर्व सीएम हरीश रावत, केदारनाथ विधायक मनोज रावत,  पूर्व कैबिनेट मंत्री मातबर सिंह कंडारी,  वरिष्ठ पत्रकार रमेश पहाड़ी, समिति के अध्यक्ष ईश्वर सिंह बिष्ट, पूर्व जिला पंचायत सदस्य देवेश्वरी नेगी, शाशि सेमवाल, शान्ति भट्ट,  अंकुर रौथान, स के साथ ही विभिन्न सामाजिक राजनीतिक और ग्रामीण लोग बड़ी संख्या में यहां मौजूद थे।

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