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Sunday, 3 January 2021

शीतकालीन यात्रा आखिर क्यों नहीं चढ़ रही परवान?

सम्पादकीय

शीतकालीन यात्रा आखिर क्यों नहीं चढ़ रही परवान?



-कुलदीप राणा ‘आजाद’/सम्पादक केदारखण्ड एक्सप्रेस

इस वर्ष कोरोना जैसी महामारी से जहाँ समूचे देश की अर्थ-व्यवस्था और व्यापार पर कुप्रभाव पड़ा है तो वहीं उत्तराखण्ड की आर्थिकी की रीढ़ मानी जानी वाली चारधाम यात्रा के ठप्प होने से यात्रा से जुड़े हजारों लोगों का कारोबार भी बंद रहा। आखिरी के कुछ महीनों में कोरोना से छूट मिली तो थोड़ा बहुत यात्रा आरम्भ हुई लेकिन करीब 5 माह तक यात्रा के बंद रहने से यात्रा से जुड़े हजारों कारोबारियों को बड़ा धक्का लगा। अब शीतकालीन यात्रा की ओर यहां के कारोबारियों की निगाहें हैं, लेकिन जिस तरह से सरकार और उसका तंत्र शीतकालीन यात्रा को लेकर उदासीन है, उससे कतई नहीं लगता है कि शीतकाल में यात्रा परवाना चढ़ पायेगी। 

वर्ष 2013 की विनाशकारी आपदा से चारों धामों की यात्रा व्यवस्था पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गई थी। उस स्थिति से उभारने के लिए साल 2014 में उस वक्त के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने शीतकालीन यात्रा को बढ़ावा देने के साथ ही इसके समुचे प्रबन्धन को प्रभावी रूप से व्यवहार में उतारने की कार्य योजना भी बनाई थी। यह सोच सही भी थी, लेकिन शीतकालीन यात्रा को  लेकर जितने नारे-वादे और बातें सरकारों द्वारा की गई थी उसे बीते सात वर्षों से अमल में ना ला पाना सरकारों की घोर उदासीनता को दर्शाता है। 



छोटे से जिले रूद्रप्रयाग में ही शीतकालीन तीर्थाटन और पर्यटन की अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं। हालांकि यहां पहले से विश्व विख्यात मिनी स्वीजरलैंड़ दुगलबिट्टा चोपता और तुंगनाथ तक पर्यटक बड़ी संख्या में पहुँचते हैं, दुर्भाग्य की बात यह है कि जिस मार्ग से यहां पहुंचा जाता है उसी मार्ग पर बाबा केदारनाथ सहित पंचकेदारों का शीतकालीन गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर भी विराजमान है किन्तु यहां तक हमारी सरकारें और प्रशासन पर्यटकों की पहुँच आजतक नहीं बना पाया है। इससे पता चलता है कि हमारा तंत्र शीतकालीन यात्रा को लेकर कितना गम्भीर है। जबकि इसी तरह से जिले में बधाणीताल, देवरियाताल, कार्तिक स्वामी धाम, कालीमठ-कालीशीला सहित दर्जनों पर्यटक और तीर्थ स्थल मौजूद हैं  मगर ये स्थल आज भी देश-दुनियां के पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों की नजरों से ओझल हैं।  

शीतकालीन यात्रा को लेकर सरकारें और हमारा प्रशासनिक तंत्र आज तक ऐसी प्रभावी योजना और रोड़ मैप तैयार नहीं कर पाया है जिससे हम बाहर से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को उन स्थलों तक पहुँचा सकें जो धार्मिक मान्यताओं के साथ प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण हैं। इसे हम अपने सरकारों और योजनाकारों की नाकामी ही कहेंगे कि प्रकृति ने हमें विरासत में इतनी बहुमूल्य धरोहरें तो दी हैं लेकिन हम उनका सद्दुप्रयोग नहीं कर पाये हैं। चोपता दुगलबिट्टा जैसे छुटपुट स्थलों तक पर्यटकों को पहुँचाना एक क्षेत्र विशेष को लाभ मिल सकता है लेकिन जिस स्तर पर शीतकालीन यात्रा से व्यापक रोजगार की संभावनाओं की परिकल्पना कर रहे हैं उसे हकीकत के पंख कतई नहीं लग सकते हैं। जरूरत है सरकारें और स्थानीय प्रशासन शीतकालीन यात्रा को लेकर गम्भीरता से कार्ययोजना बनाकर इसे अमलीजमा पहनाये ताकि यहां के अछूते पर्यटक व तीर्थ स्थलों तक देश दुनियां के पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की पहुंच आसान बन सके और वे यहां बड़ी संख्या में पहुँचे। हमारा सिस्टम शीतकालीन यात्रा को गति देने में कामयाब होता है तो न केवल पहाड़ के गुमनाम तीर्थ और पर्यटक स्थलों को पहचान मिलेगी बल्कि वर्षभर यहां  के कारोबारियों को रोजगार भी मिलेगा।

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