मत देख माँ उस पहाड़ी रास्ते को


मत देख माँ उस पहाड़ी रास्ते को

माँ!
क्यों देखती हो 
उस पहाड़ी रास्ते को 
उसी रास्ते तो उतरे हैं 
तुम्हारे बेटे दिल्ली-मुंबई को 
जो चढ़े नहीं फिर पहाड़ को।।

माँ!
कितने बरस हो गए 
उन्हें गए हुए 
कितने बसंत और 
त्यौहार चले गए 
तुमने भी तो देखा है 
उनके जाने के बाद 
कितने घर सुने हो गए 
माँ!
ये तिबारिया, घर की अलमारियां
छज्जे मैं बैठे बूढ़े बाबूजी
कितने उदास हैं
अपनों की बाट जोहते 
पर यकीन करो माँ  
तुम्हारे बाद ये घर 
खेत खलियान सब 
बंजर हो जाएगा,
आएंगे नहीं वो यहां 
जहां खेले थे वो कभी
फुदक फूदक कर।।

माँ !
भूल जाओ उस पहाड़ी रास्ते को 
जहां से गए थे तुम्हारे बेटे 
दिल्ली मुंबई को 
आदत बन गई थी उन्हें 
मोटर गाड़ी में चलने की 
एसी-कूलर बंगले मे रहने की
कैसे चढ़ते फिर वो पहाड़ पर 
भूल गए हो आधुनिकता में 
गांव की खुशहाली को 
खेतों की लहलाहाती  हरियाली को 
मां-दादी की कहानियों को 
गाय बछेड़ों के गले की घंटियों को
घुघूती हिंलास की बोली को 
फ्योली बुरांश के रंगों को 
दोस्तों के संग खेले पलों को।।

माँ! 
भूल गए वो तुम्हारे लाड प्यार को 
मत देखना माँ 
उस पहाड़ी रास्ते को 
जहां से उतरे थे 
तुम्हारे लाडले दिल्ली-मुंबई को।।।।

✒️कुलदीप राणा आजाद
संपादक केदारखंड एक्सप्रेस
मत देख माँ उस पहाड़ी रास्ते को मत देख माँ उस पहाड़ी रास्ते को Reviewed by केदारखण्ड एक्सप्रेस on July 14, 2020 Rating: 5
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