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Wednesday, 18 March 2020

सचिवालय और सरकारी कार्यालयों की बन्दी से सरकार क्या संदेश देना चाहती है?


सचिवालय और सरकारी कार्यालयों की बन्दी से सरकार क्या संदेश देना चाहती है?

-रमेश पहाड़ी/वरिष्ठ पत्रकार 
चीन के वोहान शहर से फैले कोरोना विषाणु से जनित जुकाम-बुखार से सारा विश्व प्रभावित और आतंकित है। हजारों लोगों की अकाल मृत्यु और इसके तेजी से फैलते प्रकोप से निपटने के लिए भारत सरकार के साथ ही उत्तराखण्ड सरकार ने भी व्यापक तैयारियां कीं हैं। लोगों को सावधानी बरतने और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर अत्यावश्यक होने पर ही जाने की सलाह के साथ ही साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जा रही है। इस रोग से बचाव और उपचार की भी तैयारियां संतोषजनक हैं। यह भी बताया जा रहा है कि सावधानी बरतने से इसके प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है और देश में इस रोग के उपचार से भी लोग ठीक हो रहे हैं। यह सब ठीक है। शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों की छुट्टी कर दी गई है और पूरे प्रशासन को सावधानी की स्थिति में रखा गया है लेकिन सचिवालय और कार्यालयों में  अवकाश घोषित करना समझ से परे है। ऐसे अवसरों पर कार्यालयों को अधिक सक्रिय और सचेत रहने को कहा जाता है, जबकि यहाँ उल्टा है। सचिवालय हफ्ते भर के लिए बंद कर दिया गया है, दफ्तरों के कार्मिकों को घर से काम करने के लिए कहा जा रहा है। सरकार स्वयं इससे आतंकित है, यह संदेश भी लोगों में जाता है। तब जनसामान्य का मनोबल कैसे मजबूत होगा, इस पर विचार करने की जरूरत है।
इस समय सरकारी तंत्र को अधिक उत्तरदायी और लोकोन्मुखी बनाने की बजाय उसे कार्यालयों से ही मुक्त करने की योजना औचित्यहीन है और इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। सरकार के संचालकों को सोचना होगा कि यह हमारी यदि फैलेगी तो विदेशों से आने वाले संक्रमित लोगों से फैलेगी। इस पर नजर रखना सबसे पहला काम है। फिर गन्दगी से फैलने वाली इस बीमारी से बचाव के लिए पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता को पूरा किया जाना आवश्यक है। राज्य में किसान, मजदूर, बेरोजगार, झुग्गी-झोपड़ियों, गन्दी बस्तियों में रहने वाले, साधनहीन और गरीब लोग, जो इस बीमारी की पकड़ में सबसे पहले और सबसे अधिक आ सकते हैं, इनके लिए व्यवस्थाएं कैसे जुटाई जायें, इस पर सोचना चाहिये।
राज्य में स्वास्थ्य परीक्षण की प्रयोगशालाएं और संक्रमित लोगों के समुचित ईलाज की व्यवस्थाएं मजबूत करने की बजाय सरकारी तंत्र को निष्क्रिय और निष्प्रभावी बनाने के निर्णय किस प्रकार लाभ पहुंचाएंगे, इस पर गम्भीरता से सोचने की आवश्यकता है।