बेजुबानो की लहू से लथपथ रहता है पूरा रास्ता, शादी के बाद भैरवनाथ को खुश किया जाता है बलि देकर

बेजुबानो की लहू से लथपथ रहता है पूरा रास्ता, शादी के बाद भैरवनाथ को खुश किया जाता है बलि देकर

- कुलदीप राणा आजाद/केदारखंड एक्सप्रेस

रूद्रप्रयाग। 21वीं सदी में भी सड़कों पर भी जवानों का लहू बिखरा जाता है सदियों से यहां यह परंपरा जारी है यहां शादी के बाद अलकनंदा मंदाकिनी के पवित्र दामन पर भैरव नाथ और घाट की देवी के नाम पर बेबस बेजुबान  पशुओ के खून से दागदार किया जाता है। देवभूमि उत्तराखण्ड मे धर्म के नाम पर होने वाली पशु बलि भले ही बहुत जगहों पर बंद हो चुकी हो लेकिन यह कुप्रथा आज भी कई स्थानों पर जारी है। रूद्रप्रयाग का भरदार क्षेत्र भी इसी कुप्रथा की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है।

21वीं सदी के इस भारत में बहुत कुछ बदला है। हमारे देश के भीतर चल रही कई असामाजिक कुरीतियों से हमने छुटकारा पाया है। समय के साथ-साथ हमारे समाज की सभ्यताएं भी बदली हैं। रुढिवादी परंपराओं को पीछे छोड़ सभ्य समाज और उसकी ज्ञानवर्धक परंपराओं को सजने आगे बढ़ाने का कार्य भी किया है। लेकिन कुछ परंपराएं आज भी हमारी रूढ़िवादी सोच की मिसाल पेश कर रहा है।
देवभूमि उत्तराखण्ड में देवताओं के नाम पर बेजुबान पशुओं की बलि देने की ऐसी ही एक परम्परा हैं जिसे अब नये दौर के लोग स्वीकार नहीं कर रहे हैं। मगर कई क्षेेत्रों में आज भी ऐसी परम्परा जिंदा है। रूद्रप्रयाग के भरदार क्षेत्र के गांव के लोग आज भी जब किसी की शादी होती है तो उसके पश्चात रूद्रप्रयाग अलकनंदा और मंदाकिनी संगम स्थल पर घाट की देवी और भैरवनाथ के नाम से पशु बलि देते आ रहे हैं। इसके पीछे की मान्यता बताते हैं कि जो ऐसा नहीं करता है तो उसके साथ कुछ ना कुछ अपसगुन होता है। स्थिति इतनी भयावाह रहती है कि पशु मारने बाद उसके रक्त को पूरे रास्ते बिखेरा जाता है। जिससे यहां आने वाले तीर्थ यात्री और श्रद्धालु अक्सर डर जाते हैं।

हालांकि नये दौर के लोग पशु बलि की इस प्रथा को घृणित कृत्य मानते हैं और इस पर रोक लगाना चाहते हैं लेकिन सदियों से चली आ रही पशु बलि की इस कुरीति की बेड़ियों को तोड़ने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। क्योंकि यह प्रथा आस्था से जुड़ी हुई है ऐसे में एकाएक इसे बंद करने के लिए व्यापक स्तर पर जनचेतना लाने की आवश्यकता है।
ऐसा नहीं है कि यहां के धार्मिक तीर्थ स्थलों पर दी जाने वाली पशु बलि पर पहले रोक न लगी हो। रूद्रप्रयाग जनपद में प्रसिद्ध  सिद्धपीठ कालीमठ की बात हो या फिर मठियाणा देवी मंदिर की जहां कभी सैकड़ों की संख्या में पशु बलि दी जाती है लेकिन अब पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं, और नारियल तोड़कर ही यहां पूजा अर्चना की जाती है।
किसी भी बेजुबान पशु की निर्मम हत्या कर कैसे किसी का भला हो सकता है, यह तो संभव नहीं है लेकिन सामाजिक चेतना के अभावा में आज भी ऐसी कुरीतियां हमारे समाज को अपनी गहरी जड़ों से जकड़े हुए हैं। ऐसे में जरूरत है धर्म के नाम पर इस प्रकार के आडम्बर का अंत हो। इसके लिए व्यापक रूप जन जागृति  समाज में लाई जाय। बहरहाल अब जब यह बात प्रशासन और पुलिस के संज्ञान में आई तो वे भी इस पर ग्रामीणों से बात इस प्रथा पर रोक लगाने कल बात कर रहे हैं।
बेजुबानो की लहू से लथपथ रहता है पूरा रास्ता, शादी के बाद भैरवनाथ को खुश किया जाता है बलि देकर बेजुबानो की लहू से लथपथ रहता है पूरा रास्ता, शादी के बाद भैरवनाथ को खुश किया जाता है बलि देकर Reviewed by केदारखण्ड एक्सप्रेस on March 11, 2020 Rating: 5
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