कोरोना वायरस के संकट का धैर्य व विवेकपूर्ण सामना आवश्यक


कोरोना वायरस के संकट का धैर्य व विवेकपूर्ण सामना आवश्यक
-रमेश पहाड़ी/वरिष्ठ पत्रकार 
देहरादून। दुनिया के अनेक देश चीन से फैले कोरोना वायरसजनित बीमारी से त्रस्त और आक्रांत हैं। एक बड़ी जनसंख्या इसकी चपेट में हैं और इस वायरस का फैलाव इतना तेज है कि जरा सी लापरवाही से इसका भीषण प्रकोप सामने आ सकता है। केंद्र सरकार ने इसके लिए आवश्यक निर्देश जारी किए हैं और प्रबन्ध भी किये हैं। पूरे देश में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं सुदृढ़ और पुलिस-प्रशासन को चुस्त करने के साथ देश में कुछ प्रतिबन्ध भी लागू किये गए हैं। इनमें राष्ट्रव्यापी बन्दी मुख्य है। क्योंकि इस रोग का संक्रमण अत्यंत सम्वेदनशीलता और तीव्रता से होता है। इसलिए व्यक्ति से व्यक्ति के पृथक्कीरण की कार्यवाही सबसे मुख्य है। यह स्थिति सबसे कठिन है। इसमें ढील देना किसी भी बड़े संकट को  स्वयं नियंत्रण देने जैसा है। यह स्थिति अत्यंत विकट है। स्कूल, कॉलेज, प्रशिक्षण संस्थान, उद्योग, कार्यालय आदि के साथ ही लोगों के निर्बाध आवागमन को प्रतिबंधित करने जैसे कठोर निर्णय सरकार को लेने पड़े हैं। इससे भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और विकट समस्यायुक्त देश के सामने गम्भीर स्थिति पैदा हुई है। देश में गरीबी और बेरोजगार की विकट समस्याओं के चलते अधिसंख्य ग्रामीण जनसंख्या शहरों-कस्बों में काम के लिए आती है। तमाम छोटे काम करने वाले ऐस करोड़ों लोग सड़कों पर आ गए हैं।
केंद्र और राज्य सरकारें इस स्थिति को संभालने के बारे में कुछ विलम्ब से ही निर्णय ले पाई हैं। तनिक देर से ही सही, केंद्र सरकार ने ग्रामीण गरीबों के लिए एक आर्थिक पैकेज की घोषणा की है, जिसका लाभ संगठित और पंजीकृत लोगों को तो मिलेगा और उनकी कुछ कठिनाइयां भी अवश्य कम होंगी लेकिन स्थिति से निपटने के लिए समुचित पूर्व तैयारियों की कमी के कारण एक बड़ी जनसंख्या को अभूतपूर्व संकट का सामना करना पड़ा है। इससे तात्कालिक संकट तो बना ही, भविष्य में उसके दूरगामी परिणाम देश को भुगतने पड़ेंगे।
सबसे बड़ा संकट कार्यकारी जनसंख्या का है, जो कम काम वाले क्षेत्रों से अधिक काम वाले क्षेत्रों में आकर काम करके न केवल अपनी आजीविका चलाते हैं, बल्कि देश के निर्माण व संचालन की लगभग सभी गतिविधियों में अपने खून-पसीने द्वारा बड़ा और महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। इस देश-बन्दी द्वारा इन कामगारों की जो दुर्दशा हुई है, उसका खामियाजा भविष्य की इन गतिविधियों पर पड़े बिना नहीं रहेगी। सरकारें यद्यपि अब इस दिशा में कुछ सक्रिय नही हैं लेकिन इसमें जो देरी हुई है, वह हमारे प्रबन्धन-तन्त्र पर अनेकों प्रश्न खड़े करने वाली है। परिवहन और उद्योगों में बन्दी से सड़कों पर आ गए लाखों लोगों के सामने यातायात, भोजन और आवास की समस्या से निपटने के लिए जो प्रयास अब किये जा रहे हैं, वे कुछ पहले किये जाते तो काफी लोगों को परेशानी और आतंकित होने से बचाया जा सकता था। इन कार्मिकों की नौकरियों, मकान किराये और भोजन के लिए न्यूनतम पैकेज की व्यवस्था कर दी जाती तो इस समस्या की तीव्रता व भयावहता से बचा जा सकता था। 
इस बड़ी कार्य-शक्ति को जिस त्रासदी का सामना करना पड़ा,  बाद वह सहज रूप से इन शहरों-कस्बों की ओर वापस लौटने को बार-बार सोचेगा। इसका एक दुःखद पक्ष यह भी सामने आया है कि छोटे-छोटे काम करके शहरी व कस्बाई लोगों की सेवा में लगे और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोगों की स्थिति कितनी अमानवीय बनी हुई है और इस दिशा में हमारे मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल आयोग, श्रम आयोग और अनेक कल्याणकारी संगठन, समाजसेवी संस्थाएं कितने महत्वहीन बन कर रह गए हैं। इसे भविष्य के लिए एक सीख के तौर पर लिया जा सके तो भी कुछ सुधार की आशा हो सकती है।
कोरोना वायरस के संकट का धैर्य व विवेकपूर्ण सामना आवश्यक कोरोना वायरस के संकट का धैर्य व विवेकपूर्ण सामना आवश्यक Reviewed by केदारखण्ड एक्सप्रेस on March 29, 2020 Rating: 5
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