स्थायी राजधानी ही एकमात्र विकल्प, जैंता इक दिन तो आलो यो दिन या दुनि में। भरारीसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी: राजनीतिक शिगूफा से अधिक नहीं

स्थायी राजधानी ही एकमात्र विकल्प, जैंता इक दिन तो आलो यो दिन या दुनि में।
भरारीसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी: राजनीतिक शिगूफा से अधिक नहीं


- अनसूया प्रसाद मलासी/केदारखण्ड एक्सप्रेस 
एक कहावत है-‘बारह साल का लड़का थामे तलवार और बारह साल की लड़की थामे घरबार’। उत्तराखण्ड राज्य पूरे बीस साल का हो गया लेकिन उसे भाजपा-कांग्रेस ने ऐसे फुटबाल बनाया कि उसे अपने पाँवों पर खड़ा होने के लिए बैसाखी का सहारा लेना पड़ रहा है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों में इस बात पर एकमत था कि राज्य की प्रस्तावित राजधानी गढ़वाल-कुमाऊँ के मध्य पर्वतीय क्षेत्र गैरसैंण में ही बने। तमाम आयोग और समितियों ने भी इसे ही उपयुक्त माना। लेकिन 4 मार्च 2020 को भरारीसैंण विधान सभा भवन में चल रहे बजट सत्र में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जब इसे उत्तराखंड की स्थायी राजधानी के बजाय ‘ग्रीष्मकालीन राजधानी’ घोषित किया तो आंदोलनकारियों ने इसे मात्र राजनीतिक शिगूफा कहकर इसका विरोध किया। 
 
भराड़ीसैंण विधानसभा भवन के बाहर खड़े उक्रांद नेता 
संसद ही दगा दे गई उत्तराखण्ड को
उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के लिए जब संसद में उ.प्र. राज्य पुनर्गठन विधेयक आया तो भाजपा-कांग्रेस ने अपने-अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसकी राजधानी का सवाल ही सिरे से गायब कर दिया था, जबकि इसी सदन में उसी दिन झारखण्ड और छत्तीसगढ़ राज्यों का भी गठन किया गया लेकिन उन्हें ससम्मान राजधानी भी दे दी गई। तब जो भी राजनीतिक मजबूरियां रही हों, मगर राज्य की पहली अंतरिम भाजपा सरकार का मुख्यमंत्री गैर पहाड़ी नित्यानंद स्वामी जी को बना दिया गया और एक साल बाद उनकी जगह यहाँ के मुख्यमंत्री बने भगत सिंह कोश्यारी। यही नहीं, कुमाऊँ की तराई में वैध-अवैध रूप से बसे सरदारों व बंगालियों को खुश करने के लिए श्री सुरजीत सिंह बरनाला को यहाँ का राज्यपाल बना दिया गया था।

 शार्टकट व बारहमासी यातायात सुविधा जरूरी 

बहरहाल, तभी से राज्य आंदोलनकारी पर्वतीय क्षेत्र के मध्य में बसे गैरसैंण की चोटी पर भरारीसैंण को राजधानी बनाने के लिए आंदोलनरत हैं। यह क्षेत्र दूधातोली पर्वतमाला का ही एक भाग है। इस पर्वतश्रृँखला में पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की समाधि भी कोदियाबगड़ नामक स्थान पर है। यह भरारीसैंण नामक स्थान चमोली, पौड़ी व अल्मोड़ा जनपदों की सीमा से लगा हुआ है और चारधाम यात्रा मार्ग की तरह सुरंग, बाईपास और फ्लाईओवर के जरिये नये मोटर मार्गों का निर्माण किया जाये तो पूरे राज्य से यहाँ की मोटर मार्ग की दूरी भी बहुत कम हो जायेगी। रेल नेटवर्क भी कर्णप्रयाग तक गतिमान होने से भविष्य में यहाँ विकास और यातायात की असीम संभावनाएं हैं। इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और राजनीतिक परिपक्वता से ठोस निर्णय लेने की अपेक्षा है।

जेएंडके की तरह ही खर्चीली व्यवस्था होगी ‘दरबार मूव’ की प्रक्रिया

 ग्रीष्मकालीन राजधानी का मतलब साफ है कि यह बेहद खर्चीली और व्यवस्था को लुंज-पुंज बनाने की ओर एक कदम है। जम्मू और कश्मीर में भी 6-6 महीने का ‘दरबार मूव’ महाराजा हरिसिंह के जमाने से ही चला आया है। याने कि मई से अक्टूबर तक श्रीनगर और नवंबर से अप्रैल तक जम्मू। जेएंड के की इन राजधानियों की दूरी ढाई सौ किमी. है। ठीक इसी प्रकार देहरादून और भरारीसैंण के बीच भी ढाई सौ किमी का फासला है। यह कारवाँ कितना खर्चीला होगा? इसका अनुमान नहीं लगाया गया है। 

 न्यू शिमला टाउन की तर्ज पर विकसित हो भरारीसैंण
दूधातोली पर्वत श्रृंखला का विहंगम दृश्य
अगर, मान भी लिया जाय कि भरारीसैंण विधान भवन उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी की दिशा में एक कदम है तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सचिवालय, विधान भवन,  आवासीय कालोनियाँ व महत्वपूर्ण विभागीय मुख्यालय भरारीसैंण से लेकर दूधातोली तक निर्मित किये जायेें। तुच्छ राजनीति और तुष्टिकरण के फेर में देहरादून की तरह लोगों का फजीता न हो। रुद्रप्रयाग जिला मुख्यालय भी ऐसे ही बिखराव के कारण परेशानी का सबब बना हुआ है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की तरह ही भरारीसैंण के लिए किसी ऐसे चमत्कार या विश्वकर्मा की जरूरत है, ताकि आने वाले पचासों सालों तक यहाँ विकसित होने की गुँजाईश रहे और मंत्रियों, अधिकारियों और जनता को भटकना न पड़े। यह माना जाना चाहिए कि इसी क्षेत्र में अच्छे स्कूल-काॅलेज, बेहतरीन अस्पताल, पेयजल, दूरसंचार और प्रशिक्षण संस्थान खुलें ताकि अधिकारियों व नेताओं के बच्चे भी यहीं रहें, पढ़ें और इससे पर्वतीय क्षेत्र का भी भला हो जायेगा। लखनऊवी संस्कृति जो दून में पनप गई है, से छुटकारा मिले।

गढ़वाल मण्डल मुख्यालय पौड़ी एक दुःस्वप्न
 पर्वतीय क्षेत्र में अधिकारी रहें, व्यवस्थाएं चाक-चैबंद रहें, इसके लिए गढ़वाल मण्डल मुख्यालय पौड़ी और कुमाऊँ मण्डल मुख्यालय नैनीताल में आरामदेह बंगले बनाकर मण्डल स्तरीय अधिकारी वहाँ तैनात किये गये। अफसोस कि आज तक इन स्थानों पर अधिकारी रहना पसंद नहीं करते। बीते वर्ष गठित किये गये राज्य पलायन आयोग का मुख्यालय पौड़ी बनाया गया लेकिन वह भी दो-चार कर्मचारियों के भरोसे ही है। स्वयं आयोग के अध्यक्ष वहाँ से पलायन कर गये हैं। भरारीसैंण क्षेत्र के चहुँमुखी विकास के बाद यहाँ भी मसूरी, नैनीताल, श्रीनगर, शिमला आदि पर्वतीय नगरों की भाँति यहाँ की खूबसूरती और बर्फवारी का आनंद लेने के लिए पर्यटक पहुँचेंगे और स्थानीय रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। इससे जहाँ पलायन पर रोक लगेगी, वहीं राज्य आंदोलनकारियों के सपने भी साकार होंगे। भरारीसैंण में स्थायी राजधानी भी राजनीतिक नफा-नुकसान के बजाय पहाड़वासियों के दीर्घ हितों को ध्यान में रखते हुए बनायी जानी नितांत आवश्यक है। 

स्थायी राजधानी ही एकमात्र विकल्प, जैंता इक दिन तो आलो यो दिन या दुनि में। भरारीसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी: राजनीतिक शिगूफा से अधिक नहीं स्थायी राजधानी ही एकमात्र विकल्प, जैंता इक दिन तो आलो यो दिन या दुनि में।  भरारीसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी: राजनीतिक शिगूफा से अधिक नहीं Reviewed by केदारखण्ड एक्सप्रेस on March 04, 2020 Rating: 5
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