@उषा झा देहरादून / नष्ट पर्यावर्ण (कविता)

नष्ट पर्यावर्ण

सूनी वसुधा हो रही ,कानन विटप उदास ।
पीपल बरगद कट गए,सेमल कहाँ पलास ।।

फूट फूट रोती धरा,काट रहे जब पेड़ ।
लौट गये बादल सभी,किसने दिया खदेड़ ।।

हरी भरी धरती रहे, लाए मुख मुस्कान ।
श्वास वायु पर्याप्त हो, बची रहेगी जान ।।

वृक्ष काट झोली भरे, लोभी ठेकेदार ।
बेघर पंछी हो गए , चुप क्यों है सरकार ।।

पंछी बेबस हो गए, कहाँ बनाए नीड़ ।
कंकर का जंगल जगत,दिखे नहीं अब चीड़।।

बाग गए सारे उजड़, कंक्रीट का जाल ।
मेघ बरसते हैं नहीं ,मनुज बुलाए काल ।।

हरियाली दुर्लभ हुई ,जल बिन सूखे ताल ।।
कौन बुलाए मेघ को, अब तो पड़े अकाल ।

धरा प्रदूषित हो गई, उजड़ गए जब बाग ।।
ऋतु परिवर्तन है नहीं , बुझे नहीं यह आग ।।

@उषा झा देहरादून
@उषा झा देहरादून / नष्ट पर्यावर्ण (कविता)  @उषा झा देहरादून / नष्ट पर्यावर्ण (कविता) Reviewed by केदारखण्ड एक्सप्रेस on February 27, 2020 Rating: 5
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