बंद सौ किवाड़ है..उजड़ रहे पहाड़ हैं।। सवाल बरकार है कि कौन जिम्मेदार है।

किसको किसके लिऐ बधाई दे !

-दीपक बेंजवाल
आज 9 नवम्बर है, आज ही के दिन वर्ष 2000 में ही तमाम आन्दोलनो, शहादतो और संघर्षो के बलबूते पर हम पहाड़ीयो को अपना पृथक पर्वतीय राज्य दिया गया था। तब पहाड़वासियो की उम्मीदो को मानो पंख लग गये, सबने सोचा अब अपना राज्य है अपने लोग सत्ता में होगे तो पहाड़ की हर छोटी बड़ी माँग को वो बखूबी समझेगे और उससे साकार करने का बीड़ा उठायेगे। पहाड़ की लाचारी, मजबूरी अब पुरानी बात हो जायेगी। लेकिन इस खुशी पर पहले दिन ही ग्रहण लग गया। राज्य के पहले राज्यभिषेक में ही राष्ट्रीय दलो का दोगलापन नजर आ गया। राज्य का पहला मुखिया ही गैर पहाड़ी बना दिया गया, सत्ता का हिस्सा वे बने जो अलग राज्य के धुर विरोधी थे। यह बेहद स्पष्ट संदेश था कि बेवकूफ पहाड़ीयो ये राज्य किसी पहाड़ के लिऐ नही है ये सिर्फ हमारी सत्ता के लिऐ है। तुम तो सिर्फ मोहरे हो और हमेशा मुहरे ही रहोगे। 

जिस उत्तराखण्ड नाम को लेकर मेरे पहाड़ ने इतना बड़ा संघर्ष किया भाजपा ने सत्ता में आते ही उसे दरकिनार कर राज्य का नाम उत्तराचंल कर दिया। यह दूसरी भावनात्मक चोट की गयी थी जिसे तब भी हम समझ नही पाऐ। लेकिन देहरादून राजधानी बनाकर भाजपा ने पहाड़ के सारे भावनात्मक सपनो की कब्र खोद कर रख दी। वास्तव में यह इस पूरे आन्दोलन की दूसरी सबसे बड़ी माँग थी। और आखिरकार गैरसैण को गैर कर दिया गया। फिर शुरू हुआ पहाड़ से बेगानेपन का खेल। पहाड़ के विकास की अहम जरूरत शिक्षा, स्वास्थ्य को लेकर इन बीते सालो में एक भी बड़ा संस्थान पहाड़ में नही खुला उलट पहाड़ की सैकड़ो स्कूलो को बंद करने का आदेश पारित हो गया। राज्य के नये विद्यालय श्रीदेव सुमन का मुख्यालय देहरादून, नया AIMS ऋषिकेश में खोल कर सरकार ने अपने गैर पहाड़ी इरादे की झलक फिर से दिखला दी। सड़क, बिजली, पानी पर तो तिरझी नजर पहले से ही थी अब बदला तो इतना कि नदियो, जंगलो और जमीनो को औने पौने दामो पर बेचकर यहा के नेता खूब पैसा बटोरने लगे। पंचेश्वर इसका एकदम ताजा उदाहरण है जिसमे 126 गाँव को जलसमाधि दी जानी तय हो चुकी है।

रही सही उम्मीदे उन्होने हर जगह शराब की नयी दुकाने खोल कर दी और कारण बताया यही राजस्व का सबसे बड़ा श्रोत है। उन्हे क्या फर्क पड़ता का पहाड़ का चैतू, बैशाखू दुख बिमारियो से बचने के लिऐ दवा की बजाय दारू पीकर मरता फिरे। उन्हे क्या फर्क पड़ता मंगसीरी, नौमी हर रोज मरती पीटती रहे। उन्हे तो मुनाफा चाहिऐ फिर चाहे वो किसी की लाश पर भी क्यो न हो। सरकार का मकसद कही पहाड़ को सुख पहुचाना नही था, वो पुरानी स्थितियो को बरकरार रखकर पहाड़ वैसा ही बेबस लाचार बनाना चाहती थी और सही मायनो मे कामयाब भी रही। पड़ोसी पहाड़ी राज्य हिमाचल भी इन्हे प्रेरणा नही दे पाया। जिसके नेताओ ने अपने लोगो को आत्मनिर्भर बनाने के लिऐ निति नियमो की मिसाल उत्पन्न कर दी थी। लेकिन यहा भाजपा काग्रेस ने एक चाल चली, उनके नेता तो दोनो हाथो से उत्तराखण्ड को लूटना चाहते है, और यही लूट आज भी जारी है।

दोष भी किसे दे अपने तो लोग है सत्ता में, काका, बोडा, भैजी, भुला...बस अब उनसे कैसे लड़ेगे। 

सच कहू तो अपने राज्य में ही बेगाना हो गया है पहाड़, अपने 42 निपराध बच्चो को खोकर, सैकड़ो माँ बहनो की इज्ज्त तार तार कर, उम्रभर की जिल्लत, नफरत सह कर! सो किसको किसके लिऐ बधाई दे समझ नही आता। हाँ उन 42 शहीदो की शहादत को सलाम, उन अनगिनत माता बहनो को नमन जिन्होने अपना सर्वस्व पहाड़ के एक महान सपने को समर्पित कर दिया था।

बंद सौ किवाड़ है..उजड़ रहे पहाड़ हैं।। 
सवाल बरकार है कि कौन जिम्मेदार है।

"जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में 
गाँव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में"
बंद सौ किवाड़ है..उजड़ रहे पहाड़ हैं।। सवाल बरकार है कि कौन जिम्मेदार है। बंद सौ किवाड़ है..उजड़ रहे पहाड़ हैं।।   सवाल बरकार है कि कौन जिम्मेदार है। Reviewed by केदारखण्ड एक्सप्रेस on November 08, 2019 Rating: 5
Powered by Blogger.