क्षणिका सृजन - 4

क्षणिका सृजन - 4
उषा झा

स्वार्थ टकराता रहा    क.
धाराशायी रिश्ते हुए
बाजीगर चाल चले
फँसे राजा व्यूह में 
पीछे खाई गहरी 
आगे तालवारें तनी
मरे सीने पर वार से...।।

पहचान न पाया    ख.
मोहरा बन बैठा 
अक्ल कम तो नहीं 
खतरा को भाँप न सका
घेर लिया सिपाही ..
चौकन्ना शायद नहीं था ..।

पहरेदारों का जाल में.   ग
रहता वो हर हमेशा 
घर के अंदर चींटी भी 
घुस नहीं सकता था ।

मर गया बेचारा 
शयन कक्ष में ही 
पहरेदार घर के बाहर 
पहरा देता रह गया.. ।
क्षणिका सृजन - 4 क्षणिका सृजन - 4 Reviewed by केदारखण्ड एक्सप्रेस on November 12, 2019 Rating: 5
Powered by Blogger.