Breaking News

Friday, 20 September 2019

ये अस्पताल तो जान लेकर रहेंगे, गर्भवती महिला को प्रसव वेदना में चार-चार बडे अस्पतालों में दौड़ाया लेकिन नहीं मिली जगह

ये अस्पताल तो जान लेकर रहेंगे, गर्भवती महिला को प्रसव वेदना में चार-चार  बडे अस्पतालों में दौड़ाया लेकिन नहीं मिली जगह


-राकेश चन्द्रा /ब्यूरो चीफ एपीन न्यूज़ 
देहरादून। उत्तराखंड के चमोली जिले के लंगासु से आज गर्भवती महिला लक्ष्मी देवी उम्र 28 साल जिसे प्रसव कराने के लिए श्रीनगर सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन अस्पताल ने ऋषिकेश एम्स के लिए रेफर कर दिया 4 घंटे का पथरीला सफर तय करने के बाद ऐम्स पहुंची लक्ष्मी देवी और उसके पति लखपत असवाल को उस समय अपने इंसान होने पर भी शर्म आने लगी जिस समय एम्स अस्पताल के डॉक्टरों ने लक्ष्मी देवी को अस्पताल में भर्ती करने से इसलिए मना कर दिया कि अस्पताल में बेड और वेंटिलेटर की व्यवस्था नहीं है ।।लिहाजा अस्पताल के गाइनो डॉक्टर ने गर्भवती यद लक्ष्मी देवी को जौलीग्रांट हिमालयन हॉस्पिटल में रेफर करा दिया लेकिन अफसोस की बात हिमालयन हॉस्पिटल में डॉ अविनाश ने बेड और वेंटिलेटर मौजूद नहीं है कह कर अपना पल्ला झाड़ दिया ।जबकि पीड़ित व्यक्ति लगातार जिंदगी और मौत की दुहाई देते रहे लेकिन अस्पताल ने कोई सुध नहीं ली। पीड़ित की समस्या के लिए मैंने  मुख्यमंत्री शिकायत नंबर 1905 पर भी फोन किया लेकिन इस फोन पर भी सुबह 8:00 बजे से लेकर रात्रि 10:00 बजे तक ही शिकायतें ली जाती है यह भी आज ही मालूम हुआ। यहां से भी कोई समाधान नहीं हुआ लिहाजा पीड़ित लक्ष्मी देवी और उनके पति लखपत असवाल सिनर्जी अस्पताल के लिए रवाना हो चुके हैं ।अब भगवान भरोसे ही जच्चे बच्चे की जिंदगी है ।लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ हो गई है उत्तराखंड के अस्पताल रेफर सेंटर बन गए हैं और एम्स को सफेद हाथी बना कर रख दिया गया है ना रेफर करने वाले डॉक्टरों को पता है कि जहां रेफर कर रहे हैं वहां मुकम्मल इलाज मिलेगा या नहीं मिलेगा। मरीज जिंदा बचेगा या नहीं बचेगा लेकिन रेफर सेंटर बनाने में कोई देरी नहीं की ।मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जी स्वास्थ्य विभाग आपके पास है जरा सोचिए एक गर्भवती महिला और उसके पति पर क्या गुजर रही होगी जब कोई अस्पताल उनको शरण देने को तैयार नहीं और वह भी उस कंडीशन में जब गर्भ में बच्चे की नाल उसके गले में फंस चुकी हो और अस्पताल बेड न होने का बहाना कर रहे हो। धिक्कार है ऐसे सिस्टम को इससे अच्छा होता लखपत और उसकी पत्नी घर में ही दम तोड़ देते ,लेकिन एक उम्मीद बाकी है कि सिनर्जी हॉस्पिटल, क्या पता इनकी जिंदगी बना दे लेकिन जब तक यह पोस्ट लिख रहा हूं मुझे नहीं मालूम कि सिनर्जी हॉस्पिटल भी लक्ष्मी देवी को एडमिट करेगा या नहीं, बाकी  लक्ष्मी देवी और उसके  पेट में पलने वाले बच्चे को  कोई भी दिक्कत या डॉक्टरी अभाव के कारण  परेशानी होती है  इसकी जिम्मेदारी उत्तराखंड का सरकारी सिस्टम और प्राइवेट अस्पतालों के रसूख मंद मालिकों की  होगी।

जरा सोचिए.....
Adbox