पँवालिया के संरक्षण की नहीं है किसी को चिंता-

कवि चँद्र कुँवर बर्त्वाल की पुण्यतिथि 14 सितंबर पर विशेष-
पँवालिया  के संरक्षण की नहीं है 
किसी को चिंता-
-अनसूया प्रसाद मलासी /केदारखण्ड एक्सप्रेस 
साँसें भरता है पृथ्वी पर खड़ा खंडहर।
कहाँ गए वे पुष्प सुरभि जीवन को लेकर
कहाँ उड़े वे विहग गीत ध्वनियों-से सुंदर?
घिरा झाड़ियों से उलूक के सुनता बस स्वर
सोच रहा है विस्मित होकर आज खंडहर!
  अपने स्वप्नों की समाधि बन आज खड़ा है 
  उसके ऊपर कई युगों का श्राप पड़ा है
  डरता आज स्वयं की परछाईं से खंडहर
  साँस भर रहा है पृथ्वी पर खड़ा खंडहर।
  - कवि चन्द्र कुँवर बर्त्वाल की 'खंडहर' कविता जीवन के मात्र 28 बसंत देखकर अपने समाज को कविता रूपी बृहद धन देकर अल्पायु प्राप्त करने वाले कवि चन्द्र कुँवर बर्तवाल ने मृत्यु से पूर्व अपने घर के भविष्य को लेकर जो 'खंडहर' कविता लिखी, वह आज सच साबित हुई है।
  मौत को सामने देखकर उससे दो-दो हाथ करने के लिए आतुर कवि ने मृत्यु-शैय्या पर पडे़ रहकर भी अनेक कविताएं लिखी और अपार रचना संसार देकर इस शरीर को त्यागकर विदा हुए। किंतु आज सरकार की उदासीनता से उनका पैतृक घर पंवालिया खंडहर में तब्दील हो गया है।
 रुद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर समुद्र तल से 993 मी. की ऊँचाई पर रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राष्ट्रीय राजमार्ग पर बांसवाड़ा या फिर भीरी से होकर मंदाकिनी और कंचनगंगा के संगम पर स्थित पंवालिया स्थित है। जो आज शासन-प्रशासन की नजरों से दूर उपेक्षित, वीरान और खंडहर प्रदेश बनकर रह गया है।

 कवि चन्द्र कुँवर बर्त्वाल की मृत्यु के बाद हताश और निराश उनका परिवार भी कुछ समय बाद वहाँ से अपने मूल गाँव मलकोटी लौट आया था। बाद में उनके परिजनों द्वारा सरकार को यह भूमि हस्तांतरित कर दी गई । वर्तमान में कृषि विभाग उत्तराखंड का राजकीय कृषि प्रक्षेत्र पंवालिया (बष्टी) यहां पर है। सरकार द्वारा यहाँ पर 4 पद सृजित हैं, जिनमें से तीन पर कर्मचारी हैं लेकिन कृषि फार्म दुर्दशा में चल रहा है।
 मार्च 1978 में यह फार्म कृषि विभाग ने शुरू किया। शुरू में इसका क्षेत्रफल 16.50 हेक्टेयर था लेकिन वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद अब यह 2.85 हेक्टेयर ही रह गया है। बांसवाड़ा से बष्टी मोटर मार्ग पर मंदाकिनी नदी पार कर मुश्किल से 500 मी. दूरी पर कंचनगंगा (डमारगाड) एक पैदल पुल 50 वर्ष पूर्व का बना हुआ है जो कि आज जर्जर हो गया है। 
 इस फार्म हाउस में कृषि विभाग के कर्मचारी धीर सिंह ने बताया कि -'पहले यहां सिंचित भूमि थी। खूब चहल-पहल थी लेकिन वर्तमान में यहाँ के मकान टूट जाने से और सरकार की उदासीनता से यहाँ की उत्पादन क्षमता खत्म हो गई है। मात्र 1 जोड़ी बैलों की यहाँ है और जो खेती हो रही है, उसे बंदर, सूअर और खेती के अन्य कीट नष्ट कर रहे हैं।'  इस फार्म हाउस में कृषि विभाग ने कुछ और मकान बनाये थे, जो आज खंडहर हो गए हैं। स्थिति इतनी खराब है कि कर्मचारियों के लिए रात को क्या, दिन में भी सिर छुपाने के लिए जगह नहीं बची है। कवि चन्द्र कुँवर बर्त्वाल का मकान आज खंडहर व झाड़ियों से गिरा हुआ है। दिन में भी अकेला आदमी यहाँ जाने से डरता है।
 पँवालिया की दुर्दशा देखकर पूर्व ब्लाॅक प्रमुख घनानंद सती और पीतांबर दत्त सेमवाल ने यहाँ सरकार से कवि के नाम पर कृषि या उद्यान रिसर्च सेंटर खोलने की मांग की है, ताकि समाज को इस फार्म हाउस का लाभ मिल सके तथा स्थानीय लोगों की आजीविका भी सुधर सके।
पँवालिया के संरक्षण की नहीं है किसी को चिंता- पँवालिया  के संरक्षण की नहीं है   किसी को चिंता- Reviewed by केदारखण्ड एक्सप्रेस on September 13, 2019 Rating: 5
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