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Wednesday, 11 September 2019

पारम्परिक लोक जागरों का संरक्षण कर रहे शिव सिंह काला

पारम्परिक लोक जागरों का संरक्षण कर रहे 
शिव सिंह काला
-रघुवीर नेगी /केदारखण्ड एक्सप्रेस 
चमोली। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में वैदिक काल से ही जागर गायन की परम्परा चली आ रही है। लगातार 36 घंटों तक चलने वाली जागर विधा हिमालय वासियों की अनमोल विधा है जिसे सहेजकर रखना बेहद आवश्यक है जागरों में पूरी देव गाथाओं का वर्णन किया जाता है समाज में ऐसे भी लोग हैं जो इस विरासत को आज भी संरक्षित किये हुये है नयी पीढी का इसमें रुचि न लेना चिंता का विषय जरूर है। जनपद चमोली के विकासखंड उर्गम घाटी के गीरा गांव निवासी हैं शिव सिह काला जिनका बचपन जन्म से ही अपने ननिहाल गीरा गांव में नाना नानी के यहां व्यतीत हुआ और नाना नानी का प्रिय होने के कारण रात दिन अपने साथ रखना आदत सी बन गयी।  शिव सिह ने कक्षा एक तक की पढाई प्राथमिक विद्यालय उर्गम घाटी में पूरी की और उसके बाद अपने नाना नानी के परम्परागत व्यवसाय गाय बकरी चराने में लग गया भगवान के प्रति आस्था शिव सिंह को जागरों की ओर खीच लायी धीरे धीरे देवताओं के कार्य में मन लगाकर उस समय के जागरवेता स्व हयात सिह नेगी के सम्पर्क में आया और जागर विधा के स्वरों को समझने लगा जबकि पढने के नाम पर अपने हस्ताक्षर के अलावा वर्णमाला के शब्द भी भूल गया परन्तु  मां शारदा की कृपा से जागर विधा के पारम्परिक ज्ञान का गायन चोपता मेला दयूड़ा मणों नन्दी आठों देवी देवताओं की रथयात्राओं में करने लगा इन मेलों में पश्वा जागरी ढोलवादक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है इनके द्वारा नन्दा आठों में जागर गाये जाते है जिसमें सेलंग थैंग चांई लाता उर्गम देवग्राम डुमक कलगोठ समेत सेलपाती ल्यांरी मणों नन्दीकुंड जातयात्रा लोकजात यात्रा गौरा जात यात्रा समेत कई मेलों में अपनी प्रतिभा का सराहनीय प्रदर्शन कर चुका है सन 1978 से उर्गम घाटी समेत विभिन्न मेलों में अपना योगदान दे रहा है। विलुप्त होती संस्कृति में युवाओं की भूमिका का मुह मोडने से शिव सिह काला भी बेहद चिन्नति जरूर है वो ये पारम्परिक ज्ञान को ढलती उम्र के कारण नयी पीढ़ी के हाथों सौपना चाहता है।

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