हम लड़ते रैयाँ भुलू ! हम लड़ते रुँलो...

हम लड़ते रैयाँ भुलू ! हम लड़ते रुँलो.......

-गजेन्द्र रौतेला/केदारखण्ड एक्सप्रेस 
अगस्त्यमुनि। इन पंक्तियों के रचयिता और जनता के प्रतिरोध के प्रतीक तथा उत्तराखंड के प्रख्यात जनकवि गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' की नौवीं पुण्य तिथि पर उन्हें याद करते हुए  'कविता कारवाँ' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें सर्वप्रथम उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए याद किया गया और उनके जीवन और कृतित्व पर एक वृत्तचित्र भी दिखाया गया।जिसके माध्यम से उनके बहुआयामी रचना संसार से सभी रु-ब-रु हुए।इस अवसर पर रा0 इ0 का0 अगस्त्यमुनि के प्रधानाचार्य जे0पी0 चमोला ने उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी में उनके साथ गुजारे वक़्त को याद करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड की आम जनता की पीड़ा को गिर्दा ने अपने स्वर दे कर सड़कों पर उतारा।उनके जनगीत ही जनता के प्रतिरोध के स्वर थे।इस क्रम में कविताओं का सिलसिला शुरू करते हुए शिक्षिका सरिता पंवार ने नरेश मेहता की कविता 'वृक्षत्व' ,भवानी प्रसाद मिश्र की मैं जो हूँ, बंशीधर पाठक'जिज्ञासु की मुझको प्यारे पर्वत सारे, तथा गिर्दा की पहाड़ की एक मनमोहक शाम कविताओं को पढ़ा।अजीम जी प्रेमजी फाउंडेशन के रजनीश बहुगुणा ने कवि आलोक धन्वा की 'भागी हुई लड़कियाँ' कविता के माध्यम से लड़कियों के प्रति सामाजिक नजरिये पर प्रहार किया। छात्रा कु0 नेहा भट्ट ने हिमवंत कवि चन्द्रकुंवर बर्त्वाल की कविता ' नीला देवदार का वन है' का सस्वर पाठ कर सबका मन मोह लिया।कविताओं के इसी क्रम में शिक्षिका और कवियत्री दमयंती भट्ट ने साहिर लुधियानवी के प्रसिद्ध गीत साथी हाथ बढाना को अपने सुरों में गाया।राज्यश्री भंडारी ने कवि केदारनाथ अग्रवाल की प्रसिद्ध
कविता 'धरती की कविता' का पाठ किया।कविताओं के इस सिलसिले को आगे बढाते हुए ललिता रौतेला ने संघर्ष और आंदोलनों के प्रतीक बन चुके गिर्दा के गीत 'हम लड़ते रुँलो' का पाठ किया।अजीम जी प्रेमजी फाउंडेशन के सर्वेश पाण्डेय ने भी गिर्दा की ही एक हिन्दी कविता ' वक़्त का सिलसिला' पढ़कर गिर्दा को अपनी श्रद्धांजलि दी।वरिष्ठ पत्रकार हरीश गुसाईं ने जहाँ एक तरफ सलिल सरोज की कविता ' तेरा न बोलना बहुत देर तक खलेगा ' से वर्तमान हालात की ओर सचेत रहने का इशारा किया वहीं दूसरी ओर कवि ओम व्यास की एक हास्य-व्यंग्य की कविता से ' हम नीचे से मंहगे हो गए और ऊपर से सस्ते हो गए हैं' से वर्तमान सामाजिक स्थिति पर चुटीला व्यंग्य किया।शिक्षक और कवि गिरीश बेंजवाल ने अपने छात्र जीवन में गिर्दा की कविताओं और जनगीतों के अपने अनुभवों को साझा किया।

कविताओं के इस सिलसिले के अंत में कार्यक्रम के आयोजक गजेंद्र रौतेला ने गिर्दा के प्रसिद्ध जनगीत 'ततुक नी लगा उदेख,घुनन मुनई नि टेक। जैंता इक दिन त आलो, उ दिन यो दुनी में' गाकर कार्यक्रम का समापन किया।इस अवसर पर उन्होंने गिर्दा के साथ गुजारे अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि गिर्दा ने भले ही ज्यादातर गीत संघर्ष और आंदोलनों के गीत लिखे हों लेकिन उनके 'दिल लगाने में वक़्त लगता है,डूब जाने में वक़्त लगता है।वक़्त को जाने में कुछ नहीं लगता,वक़्त को आने में  वक़्त लगता है ' जैसे गूढ़ दार्शनिक गीत भी उतने ही महत्वपूर्ण और प्रचलित हैं जो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाती है।
हम लड़ते रैयाँ भुलू ! हम लड़ते रुँलो... हम लड़ते रैयाँ भुलू ! हम लड़ते रुँलो... Reviewed by केदारखण्ड एक्सप्रेस on August 23, 2019 Rating: 5
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